आज सोने का मन है..!!
सुनो बांट लेते हैं आज
आधी आधी रात
आधा आधा चांद
सुबह हिसाब कर लेंगे
आज की रात
आज की रात
तुम अपने होठों पर थोड़ी सी चुपि रख लेना
मेरा और चाँद का
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
सुनो बोलनें दो खामोशियों को
सरकने दो रात को
आहिस्ता आहिस्ता
चांद आता रहे खिड़की से
थोड़ा थोड़ा
बंद किवाड़ों से भी
और साथ ही आती रहे ठंडी हवा
ठंडी हवा लाए साथ अपने रात की रानी की महक..
ऐसे में तुम प्रेम लिप्त तेल में डूबी उंगलियाँ मेरे सर पर फेरों..
और गाओ कोई मधम गीत
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
सुनो अपने अपने हिस्से के आसमान में
तुम और मैं
कोई टूटता तारा ढूंढते हैं
और मनाते हैं कोई रूठी हुई मन्नत
शायद आज पूरी हो
जो तुम्हारी और मेरे दिल की आरजू है
गुफ्तगू है
पुरे दिन
सूरज सी दहकी हैं
मेरी और तुम्हारी धड़कनें
ऐसे में
चलो
चांदनी को निचोड़कर
एक दूसरे के
माथे पर रख देते हैं
शायद तुम्हारी और मेरी गर्म रातों को
थोड़ी ठंडक मिल जाए
और मिल जाए
गर्म सांसों को
आराम आ
की तुम्हे मेरी और मुझे तुम्हारी बाँहों में..
पनाहों में
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
बिखरने की आदत है,
यूं समेट लो मुझको
कि सहर होने तक
समूचा रहे जिस्म,
साबुत हो रूह
रतजगे बहुत हुए
सिरहाने रोना मत ऐ दोस्त
ख्वाब गीले हो जाएंगे
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
सुनो बांट लेते हैं आज
आधी आधी रात
आधा आधा चांद
सुबह हिसाब कर लेंगे
आज की रात
आज की रात
तुम अपने होठों पर थोड़ी सी चुपि रख लेना
मेरा और चाँद का
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
सुनो बोलनें दो खामोशियों को
सरकने दो रात को
आहिस्ता आहिस्ता
चांद आता रहे खिड़की से
थोड़ा थोड़ा
बंद किवाड़ों से भी
और साथ ही आती रहे ठंडी हवा
ठंडी हवा लाए साथ अपने रात की रानी की महक..
ऐसे में तुम प्रेम लिप्त तेल में डूबी उंगलियाँ मेरे सर पर फेरों..
और गाओ कोई मधम गीत
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
सुनो अपने अपने हिस्से के आसमान में
तुम और मैं
कोई टूटता तारा ढूंढते हैं
और मनाते हैं कोई रूठी हुई मन्नत
शायद आज पूरी हो
जो तुम्हारी और मेरे दिल की आरजू है
गुफ्तगू है
पुरे दिन
सूरज सी दहकी हैं
मेरी और तुम्हारी धड़कनें
ऐसे में
चलो
चांदनी को निचोड़कर
एक दूसरे के
माथे पर रख देते हैं
शायद तुम्हारी और मेरी गर्म रातों को
थोड़ी ठंडक मिल जाए
और मिल जाए
गर्म सांसों को
आराम आ
की तुम्हे मेरी और मुझे तुम्हारी बाँहों में..
पनाहों में
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
बिखरने की आदत है,
यूं समेट लो मुझको
कि सहर होने तक
समूचा रहे जिस्म,
साबुत हो रूह
रतजगे बहुत हुए
सिरहाने रोना मत ऐ दोस्त
ख्वाब गीले हो जाएंगे
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"
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