Tuesday, 25 March 2014

अमलताश...!!

अमलताश...!!

February 3, 2014 at 9:31pm
मुझे "अमलताश" के पीले पुष्प बहुत पसंद हैं..
इनमे महक तो नही होती
पर फिर भी ये जीवन को महका जाते हैं..

अमलताश....!!

पीले रंग के फूल खिलते हैं.. तो ये अमलताश का वृक्ष देखते ही बनता है..
भोर के समय में या चाँदनी रात में इसकी सुंदरता देखते ही बनती हैं..
ऐसे में कब इसके पुष्प और इसकी छाँव ने मुझे मोह लिया मैं नही जानता पर आज भी जब देखता हूँ पीले पुलों से लदे अमलताश के वृक्ष को तो कुछ अतीत के पन्ने खुल जाते हैं.. और खिल जाते हैं पीले पुष्प..

ऐसे में कल बसंत और सब कुछ पीला..
उन्ही पीली सुनहरी यादों में ढूबे कुछ लाल शब्द..

कल बसंत हैं..
और खिल रहा है..
अमलताश..
हाँ आज वो वृक्ष थोडा बड़ा है..
पर फूलों से लद कर वो छोटा ही दिख रहा हैं..
तुम तोड़ सकते हो..
बिना किसी संकोच के..
और सजा सकते हो अपने कमरे में..
अमलताश..
आज भी याद है..
जब तुम तोड़ रहे थे..
अमलताश और तुम्हारा हाथ नही पहुंच रहा था..
ऐसे में तुमने आवाज़ दि..
मैं अनजान था..
पर कहा जरा मदद करो
तो तुम मेरी मदद से चढ़ गए पेड़ पर..
और तोड़ने लगे..
पीले पुष्प..
तोड़ने के बाद मुझे थमा दिए..
और कहा देखो टूटे ना..
थामते हुए एक गिरा तो चिल्ला दिए..
ढंग से पकडो..
तुममे शैतानी थी..
और चंचल पन..
पर उतरते हुए तुम्हे चोट लग गई..
ऐसे में तुम्हे थामे..
एक हाथ में तुम्हारा हाथ..
और तुम्हारे एक हाथ में पुष्प..
और तुम्हारे होंठों पर संगीत..
अदभुत वो दृश्य आज भी छलक उठता है..
और बह  उठता है..
मैं तुम्हारे साथ चल रहा था..
एक अनजान डगर एक अनजान साथ..
ना मंजिल का पता..
पर हाथ इस विश्वास के साथ पकड़ा था कि कभी छोड़े गे नही..
तुम्हारे घर पहुंचे..
बाहर से जाने को कहा था..
कहा अंदर आओ दोस्त..
यंहा तक आए हो तो अंदर आओ
तुम्हारे निमत्रण को अस्वीकार कैसे करता
अंदर गया तो माँ ने पूछा ये कौन..
तुमने कहा ये दोस्त हैं मेरा...
कुछ अजीब था..
पर अच्छा लग रहा था..
तुम्हारे साथ कमरे में..
तुम जितने चंचल तुम्हारा कमरा उतना सादा..
पढ़ने कि मेज व्यवस्थित ढंग से...
और किताबों का अच्छा संग्रह..
और एक तरफ कुछ अमलताश के पुष्प..
और कृष्ण कि प्रतिमा..
जिसने मेरे मन को मोहा..
तुमसे अलविदा लेकर घर आया तो..
बस आज मेरे चहरे पर खिल रहे थे अमलताश के पुष्प..
.....

शाम का वो समय जब तुम्हे अचानक देखा अमलताश के वृक्ष के नीचे..
तुम बैठे हुए थे..
और कुछ लिख रहे थे..
संकोच वश
पर तुम्हे हेल्लो बोला तुमने पहचान लिया..
कहा बैठो..
तो मै बैठ गया...
बातों के सिलसिले..
ऐसे में सवाल और जवाब..
......

to be continued

मयूरपंख

मयूरपंख

February 1, 2014 at 8:03pm
"मयुरपंख"
जितने मेरे दिल के करीब है..
उसी दिल ने जन्मी हैं ये कविता.. आशा है आपके भी दिल तक पहुंचेगी...!!

तुम्हे पता है..
आज भी जब मन उदास होता है तो किताब से निकाल कर देख लेता हूँ.."मयुरपंख"
और कह देता हूँ दिल का हाल..
जैसे तुम हो मेरे सामने और मैं तुमसे बातें कर रहा हूँ..
बातें करते करते खो जाता हूँ
पुरानी यादों में..
.......
कितने भोले थे तुम...
और मासूम भी..
तो नटखट और चंचल भी..
चहरे पर मुस्कान लिए जब भी मुझसे मिलते
तो दिखाते थे.. अपनी जेब से निकाल कर.."मयुरपंख"
और तुमने अपनी हर एक किताब में
हर एक पुस्तक में संजो कर रखा हुआ था "मयुरपंख"
........
याद है वो शाम..
जब
तुम ने मुझे वह मयुरपंख दिखाया...
मुझसे कहां इसे किताब में रखकर रोज प्रणाम करो तो ’मयुर’ बन जायेगा...
मै कितना अच्छा दोस्त था तुम्हांरा फ़िर भी तुमने सिर्फ़ एक बार छुने दिया था...
मानो सचमुच का मयुर था...
मुझे कितनी इर्षा हुई थी...
जिस दिन मेरा जन्मदिन था...मैंने मौका पाते तुमसें वह मयुरपंख मांग लिया...
पर तुमने मुझसे दोस्ती तोड दी...मुझसे?
अब मैंने भी ठान लिया...मुझे वह मयुरपंख चाहिये...
मैंने तुम्हांरी किताब से वह मयुरपंख चुराया...
उसी रात तुम बिमार हुए...बहुत बिमार... हफ़्ताभर दवा लेने के बाद भी ठिक नही हुए...
और इलाज के लिए शहर चले गये... फ़िर लौटे ही नही..
बस लौटी तो एक सजा..
उम्र भर अकेले रहने कि..
......
खबर आई कि तुम अब शहर में ही पढोगे..
क्यूँ कि तुम्हारे पिता जी का वंही तबादला हो गया है..
मेरे होठोंकी मुस्कान जैसे छिन गयी थी...
सिर्फ़ एक चीज थी तुम्हांरा वह ’मयुरपंख’ जिसे देखकर मैं मुस्कुरा लेता...
और तमाम बातें करता
ऐसे में खुद को बस जोड़ लिया दो चीजों से एक कान्हा और दूसरा तुम्हारा "मयुरपंख"

ऐसे में कब किताबों से और कब घर वालों से दूर हो गया पता ही नही चला..
अब मै मयूरपंख और मेरे अधूरे शब्द..
सजने लगे..
ऐसे में घर के पास कान्हा जी का मंदिर..
तो शाम और सुबह उनके चरणों में..
और कभी जब मन बहुत खुश होता तो..
"मयूरपंख"
कान्हाजी के मस्तक पर सजा देता..
और उन्हें देख कर तुम्हे.., तुम्हारे भोले चहरे को याद करता..
और छलक पड़ते आँसू
और बह उठता मैं..
तुम्हे पता है
अपने दिल की बात किससे कहता ...किसको अपना दुखडा सुनाता  जब यह सवाल परेशान करता... मैं चली जाता मंदिर ...
तुमसे बातें करना मेरी आदत बनती जा रही थी... और मैं मजाक का विषय...
.......
लोग पागल कहने लगे तो..
घर वालों ने एक कान्हा कि मूर्ति ला दि..
अब मेरी सीमाएं थी..
घर कि छत..
और मेरा कमरा..
और कान्हा...
वही एक मेरा अपना साथी था...
थे तो तुम भी "मयुरपंख" के रूप में..
और बहुत खुश था मैं अपने ’कान्हा’ को देखकर...
तुम्हांरा मयुरपंख अब उनके सर पर विराजमान देख कर...
कभी कभी तुम्हांरा भोलापन याद आजाता...
.......
अब मैंने कापी हाथ में लेके तुमसें की जाने वाली सारी बातें उस कापी में लिखना शुरू किया...
और फ़िर मैं अनायास लिखता चला गया... क्या क्या न लिख डाला मैंने...
ना जाने मेरे जिंदगी के कितने ही उतार चढाव के साक्षी था तुम्हांरा यह ’मयुरपंख’...
........

कल अचानक तुम्हें देखा...
हां..तुम ही तो थे...
वही सांवला रंग और सागर जैसी विशाल भोली आंखे...
जब सामना हुआ तो हिचकिचाहट हुई...
मैंने तो तुम्हें कभी भुलाया ही नही था... पर तुम तो भूल चुके होंगे शायद...
पर नही मेरा नाम पता चलने पर तुमने पुछ ही लिया... ओहो... मैं खुशी को सम्भाल नही पाया..
और छलक पड़ा..
और निकाल कर सामने रख दिया तुम्हारे तुम्हारा "मयूरपंख"
मयुरपंख देखा तो तुमने पुछ ही लिया...
’मैं कितना बुद्दु था ना? मयुरपंख से मयुर बन जायेगा ऐसा सोचा करता था’...
तुम्हें क्या पता इस मयुरपंखने कितना साथ दिया है मेरा...
मेरे जीने की चाहत को हमेशा उजागर किये रखा...
जब भी मैं उदास था मुझे मुस्कुराना सिखाया..तुम्हांरे इस "मयुरपंख" ने......
हां सचमुच...
और कितने भोले थे तुम..
पर आज तक एक सवाल जिसका जवाब तुम थे या "मयूरपंख"
.................................. "दिव्यंकर"



ख्वाब..!!

ख्वाब..!! (३)

March 8, 2014 at 10:02am
ख्वाब..!! (३)

अक्सर रुलाते हैं..
जब ये टूट जाते हैं..
........................

आँखों से नोच कर फेंक दिए..
जो तुझे लेकर ख्वाब देखे थे..
उन्हें खुद ही तोड़ दिए..
तेरी खुशी के लिए..
तोडना भी लाज़मी ही था..
तू किसी और की आँखों का ख्वाब है..
और वो तुझे लेकर बहुत पहले से लेकर ख्वाब सजा रहा है..
ऐसे में मैं भी उन्ही ख़्वाबों की इच्छा करूँ..
ये सही नही..
तो तुम खुश रहो..
और तुम और वो दोनों मिलकर एक हसीं ख्वाब देखो..
जो कभी ना टूटे.. "दिव्यंकर"
........

ख्वाबों का क्या है..
हर रात सजते हैं..
मेरी पलकों पर..
और हर भोर बहते हैं हैं..
ख़्वाबों का क्या है..
ये रेत से..
खारे पानी की तरह..
चुभते हैं...
मेरी आँखों में..
और जगा देते हैं..
रुला देते हैं..
कभी हंसा देते हैं..
ख्वाबों का क्या है..
हर रात सजते हैं..
कभी मैं तन्हा..
कभी तेरे संग रह कर भी तन्हा..
तेरे जिक्र में मेरा अक्स ढूंढते हैं..
ख़्वाबों का क्या... "दिव्यंकर"

 

ख्वाब..!! (२)

February 6, 2014 at 8:26pm
ख्वाब..!! (२)
शायद आखों के किसी कोने में छुप कर बैठा था..
मेरे ये हसीं "ख्वाब"
तुम्हे देखा तो छलक पड़ा..
चहरे पर चंचल हंसी के साथ..
तुम से मुझे जो जोड़े रख सकता हैं.. ये वो "ख्वाब" है..
जो तुम भी देखते हो.. पर कहते नही

ये "ख्वाब" है.. एक बार फिर से बच्चपन को जीने का..
ये "ख्वाब" हैं.. एक बार फिर से मचलने का..
ये "ख्वाब" हैं.. सो हुई धड़कन को जगाने का..
ये "ख्वाब" है.. तुम संग एक सदी जीने का..
ये "ख्वाब" है.. रूठने मनाने का..
ये "ख्वाब" हैं.. थोडा जिद्दी होने का..
ये "ख्वाब" हैं.. तुम्हारी मेरी खुशी का.. "दिव्यंकर"

ये ख्वाब हकीकत से बहुत दूर है..पर उम्मीद है कि तुम मैं एक दिन इसे हकीकत बनायेंगे..
और फिर गूंजेंगी.. किलकारियां..
हमारे आशियाने में..
जंहा फिर पल बैठेगा.. एक ख्वाब किसी के उज्वल भविष्य का..


ख्वाब..!!

February 6, 2014 at 12:31pm
मेरा बस यही ख्वाब.. हैं..

तुम्हारा साथ..
एक ऊची इमारत में अपना आशियाँ..
सुबह जब
उस आशियाने कि जब हम खिड्की खोले तो..
दूर तक दिखे
बस नीला रंग..
और बह रही हो ठंडी हवा..
ऐसे में..
तुम मैं खो जाए एक दूसरे कि बातों में..
और गुनगुनाने लगे खामोशियाँ..

शाम गुलाबी हो..
और मैं तेरे लबों से पियूँ शाम कि गर्म चाय..
ऐसे में उस गुलाबी रंग में तू और मैं रंग जाए..
और महक उठे गुलाब जो हमने बोयें थे..
फूलदान में..

रात को छत पर..
तुम मै..
और बस हो तन्हाई...
तारों कि छांव में चाँदनी रात में..
तुम संग प्यार कि थोड़ी सी हो लड़ाई..
रूठना मनाना..
फिर गले लगाना..
प्यार के एहसास में डूब जाना..
जब पड़े चहरे पर धूप करकरारी...
आँखें मलते हुए उठाना..
तुम्हे जगाना..
और प्यार से कहना आज फिर देर हो गई..
ऑफिस के लिए.. "दिव्यंकर"

बर्फ..!!

बर्फ...!! (३)

January 28, 2014 at 7:22am
कल रात तेरी यादों कि धुंध..
इतनी गहरी थी कि..
मेरी आँखों से बरसात तो हो नही पाई..
पर कुछ बूंदे ठहर कर रह गई..
मेरी पलकों पर..
ऐसे में खाली और भारी मन के साथ..
सुबह उठ कर जो एक सफर इख्तियार किया..
तुझसे मिलने का..
तभी याद आई वो कल रात कि बात..
जो तुमने बोली थी..
वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है..
तुम भी बदल जाओ
और छोड़ दो ये चाहतों का सिलसिला..
जिसके कोई मायने नही..
जिसकी कोई मंजिल नही..
तेरा और मेरा कोई वास्ता नही..
ये वो सफर है जिसे हम कुछ दूर तक साथ तो चल सकते हैं..
पर वक्त के एक अहम पड़ाव पर हम बिछड़ जायेंगे..
या तो ये रस्मे मोहब्बत हमे दूर कर देगी..
या फिर समाज कि रिवायतें..
इससे पहले ऐसा कुछ हो..
या हम एक दूसरे कि मोहब्बत में इतने मगरूर हो जाए..
या बंध जाए एक दूसरे से मोटी और माला कि तरह..
कि अगर जुदा हों तो बिखर जाए..
और सम्भाल भी ना पाए..
इससे अच्छा है पहले ही सम्भल जाए और छोड़ दें एक दूसरे का साथ..
और जमा लें एक दूसरे के एहसास को बर्फ कि तरह..
कि अगर ये कभी पिघले भी तो बह जाए.. सारे एहसास आँसुओं.. में "दिव्यंकर"
ऐसे में मैं सुनसान सफर पर चल तो रहा था..
पर जाऊं किधर ये सोच कर चौराहे पर रुक गया..एक डगर तेरी और..एक वापस लौटने कि..
एक नए सफर पर चलने कि..
पर कंही ना कंही जो राह मुझ तक आती है वो तुझ तक भी तो जाती होगी..
तभी पड़ने लगी..
बर्फ.. जिसने हर राह तो सफेद कर दिया.. "पाक"
और मन में इस विश्वास के साथ चलने लगा एक नई डगर पर कि कभी ना कभी तो तुम तक पहुंचेगी..
और जब देखों के मुझे बरसों बाद अपने सामने तो पिघल उठेगी.. तुम्हारे कदमों पर जो बर्फ जम गई है..
और तुम मेरा हाथ थम कर कहोगे चलो एक बार फिर साथ चलें..
उस सफर पर जंहा बर्फ ना पडती हो..
खामोशियाँ ना हो..
जंहा बस तुम मै और प्यार हो.. "दिव्यंकर"

 

बर्फ...!! (२)

January 25, 2014 at 10:03am
मेरे जज्बात और एहसास
इस ठंड में जम गए हैं बर्फ कि तरह..
हर रात बस होती है तो धुंध
जो सुबह तक छटने का नाम नही लेती..
और दूर तक नही दिखता कोई उम्मीद का सूरज..
ऐसे में बर्फ पर पड़े तुम्हारे कदमो के निशाँ जो मुझसे दूर जाते दिखते हैं..
पर एक आस है कभी तो ये बर्फ पिघलेगी
और मीट जायेंगी ये सारी गलतफहमियाँ..
फिर सब कुछ पहले जैसा होगा..
वही शोर वही खुशबू और वही नजारे..
पर जिस तरह इस बार कि बर्फ बिछी है..
और खामोशियों कि गूंज हर तरफ हर और से उठ कर
बस यही कहती हैं..
अगर ये बर्फ पिघेलेगी भी तो सब कुछ बहा ले जायेंगी
वो तमाम यादें जो दफन हैं इनके नीचे..
तो बस एक उम्मीद ये बर्फ भी पिघले और तुम्हारे कदमों कि आहट हो
नया दिन हो.. और धूप हो..
बरसात हो..
और पड रही हो चाहत कि बर्फ.. जिसमे सुलग कर तुम ना जा पाओ..
मुझसे दूर "दिव्यंकर"

बर्फ...!!(१)
 
बर्फ जमने लगी है.
तेरे मेरे रिश्ते में
और मीलों तक बिछ गई है..
खामोशियों कि सफेद चादर..
ना तुम तक कोई सदा पहुंचती हैं..
ना मुझ तक कोई आती है..
और अगर आती भी हैं तो
ठंडी आहें..
धुएँ में लिपट कर.. "दिव्यंकर"

तुम वापस आ जाओ..!!

तुम वापस आ जाओ....!!

कल रात किसी के द्वारा दि गई एक तस्वीर और शीर्षक पर कुछ लिखने का प्रयास .. आशा है आप सबको पसंद आएगा.. और आपके दिल तक जरुर पहुंचेगी.. !!
..........................

रात नौ बज कर तीस मिनट... (९:३०) और तारीख ३१-१२-२०१३..
वही दिन वही समय बस साल अलग है..
याद है..!!
वो ३१-१२-२०१२ कि रात जब हम पहली बार मिले थे..
भूल भी कैसे सकते हो..
एक साल का लम्बा इंतज़ार जो खत्म हो रहा था..
तुमसे मेरा और मेरा तुमसे मिलने का..
ऐसे में जो मेरा हाल था शायद वही तुम्हारा..
आखिर वो दिन आ ही गया
जब हम मिलने वाले थे..
और अपने प्यार कि एक नई शुरुवात जो होने वाली थी..
शुरुवात एक नए कल कि
और
शुरुवात एक नए साल कि.... !!
.................
पहली बार जब तुमसे बात कि थी फेसबुक पर तो बात झगड़े से शुरू हुई..
और ये झगड़ा कब दोस्ती दोस्ती से प्यार में बदल गया पता ही नही चला..
एक दूसरे से ज्ञान कि बातें बाटते बाटते कब हम प्यार बाटने लगे नही पता..
मै तो आज भी वो दिन कर के हंस देता हूँ..
जब तुमने कहा था बुद्धू महाशय अपना नॉ दो.. तुम्हे फोन पर समझाऊंगा कि
"protein modulation" मैंने भी कहा ठीक है.. ये नॉ है *******६०१ और हाँ शाम को ७ बजे के बाद..
तुमने कहा ठीक है पता है..
.............
पुरानी बातों कि जितनी परतें खोलो तो एक नई परत खुल जाती है..
और ताज़ा हो जाता है कोई भूला बिसरा किस्सा..
याद है २८-१२-२०१२ जब हमने मिलने का फैसला किया था
फोन पर लम्बी बातऔर फिर एक दूसरे से मिलने का वादा..
कि तय समय तय वक्त पर एक दूसरे से जरुर मिलेंगे..!!
.............
२९-१२-२०१२ और ३०-१२-२०१२

फेसबूक और phone msgs के जरिये एक दूसरे से बात और बार बार बस मिलने कि खुशी का इंतज़ार.
...........
३१-१२-२०१२
आखिर वो दिन आही गया..
रोज़ कि तरह सुबह उठ कर अपनी दिनचर्या में लगा रहा..
मन में एक खुशी और साथ ही एक डर
और ऐसा लग रहा था आज मैं किसी और दुनिया में हूँ.. और मेरे music system में बज रहे थे तो बस लता जी के गाने..
"आज कल पांव जमीं पर नही पड़ते मेरे..
बोलो क्या देखा है तुमने मुझे कभी उड़ते हुए"
और कब दिन से शाम और शाम से रात हो गई पता ही नही चला..
रात ८ बज कर १५ मिनट..
मैंने माँ से कहा मैं न्यू इयर पार्टी के लिए जा रहा हूँ..
शाम रात को ११ बजे तक आजाऊंगा..
हाँ पार्टी में जाना महज एक बहाना था.. तुमसे मिलने जो आना था..
अपने कमरे में गया तो २० मिनट इसी में लग गए कि क्या पहनू.. फिर ध्यान आया..
तुम्हे लाईट स्काई ब्लू कलर बहुत त पसंद हैं तो बस अपनी अलमारी से निकली और पहन ली..
झट पट तैयार हुआ..
तुम्हे देने को जो गुलाब और तुम्हारी पसंद कि चॉकलेट खरीदी थी बैग में डाली और घर से निकल पड़ा..
मेरे घर से २० मिनट कि दुरी पर था तो पैदल ही आया..
इस वक्त दिल कि धडकने बहुत तेज थी और साथ ही सांसों कि रफ्तार..
बार बार लम्बी साँसे लेता और छोड़ता..
आखिर पहुंच गया तय समय से ३० मिनट पहले..
और देखने लगा चरों तरफ..
तो दूर तक कोई नही था..
सड़क सुनसान..
बस थी तो एक सड़क मुझ तक आती थी या मुझसे हो कर जाती थी.. नही पता..
तभी दूर से कोई आता हुआ दिखा..
शायद तुम थे..
हाँ तुम्ही तो थे..
तेज कदमों से मेरी तरफ बढते हुए..
मैंने फोन निकाला और कॉल कि..
तुमने उठाया तो समझ गया तुम ही हो..
रेड शर्ट., ब्लैक हाल्फ जैकेट और क्रीम ट्राउजर..!!
तुम्हे देख पाता कि तुम सामने खड़े थे..
हे कैसे हो.. बढिया
और तुम....मै भी..

वो: देर तो नही कि..
मैं: नही मै ही जल्दी आगया था.. और हम हंस दिए हम दोनों उस सुनसान सडक पर कुछ गूंज रहा था तो हमारी हंसी..
बातें हो रही थी..
और मैं बस उसे देख रहा था और मेरी पलकें झपक भी नही रही थी..

मै: बैग को कंधे से उतारते हुए ये तुम्हारे लिए..
वो: क्या है ये..
मैं: खुद ही देख लो..
वो: गुलाब और चॉकलेट “शुक्रिया”
मैं: शुक्रिया “हू..”

वो: अच्छा बाबा नही बोलता..
खुश
मैं: चहरे पर एक हंसी लिए.. हाँ खुश..
वो: यंही बात करोगे चलो कंही चलते हैं किसी café ya restaurant बहुत भूख लग रही है..
तुमसे मिलने आने कि जल्दी में कुछ खाया भी नही..
मै: तो मैंने कौन सा खाया है..
वो: फिर चलो
चलते चलते..
मै: वैसे एक बात कहूँ
वो: हर बार कहा है जो कहना हो कह दिया करो.. पूछा मत करो..
बोलो
मैं: तुमने बहुत सुन्दर हो

वो: तुम भी अच्छे लग रहे हो.. ब्लू शर्ट.. में..
मै: हाँ तुम्हे पसंद हैं ना इसलिए..
तुम्हारी एक एक छवि को दिल में भर रहा था..
और हमारे जिस्म दूर थे पर सांसों से उठता धुंआं एक दूसरे को छु रहा था..

आखिर राह चलते तुमने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया और कहा..
हे आज कुछ कहो सिर्फ मेरे लिए..
मैं कहना तो बस कुछ चाहता हूँ
पर आज बस इस लम्हे को जीना चाहता हूँ..
और तुम्हारे साथ इस साल को विदा करना चाहता हूँ..

हम restaurant पहुंचे तो तुमने अपनी पसंद का खाना मंगवाया हमने एक ही थाली में खाया और तुमने मुझे अपने हाथों से खिलाया.. मैं खुश था और कब आँसू निकल गए पता ही नही चला..
तुम हे क्या हुआ..
क्यूँ रो रहे हो..
कुछ नही बस ऐसे ही..

... आखिर १० बज कर १५ मिनट अच्छा अब चलना चाहिये..
मैंने तुम्हे ऑटो स्टैंड तक छोड़ा और जाते जाते तुमने अपनी जेब से छोटा सा गिफ्ट निकला और कहा घर जा के देखना..
घर आया तुम्हे कॉल कि पहुंचे उसने कहा बस ५ मिनट और तुम..
मै अपने बेड पर हूँ..
और तुमने कहा ठीक है आराम करो..
मै पहुंच कर msg कर दूँगा..
मैंने गिफ्ट खोला तो देखा उसमे एक खूबसूरत बॉक्स जिसमे एक मोती और कुछ गुलाब कि पंखुडियाँ.. और एक कागज पर कुछ पंक्तियाँ
जड़ा कर अंगूठी में ये मोती तुम पहन लेना..
और स्वीकार करना मेरा प्रेम..
मेरे चहरे पर खुशी.. तुम देख पाते..
............

१ जनवरी २०१३ सुबह उठ कर तुम्हे न्यू इयर कि बधाई..
और फिर बात..

अब बातों में शरारतें.. थी
और मिलने के सिलसिले..
याद है ४ जनवरी जब तुमने मेरे हाथ में अंगूठी देखी तो चूम लिया था मेरे गालों को
आज भी वो एहसास मेरे गालों पर है..
अब हम एक दूसरे के घर आने जाने लगे.. और तुमने मेरे घर में एक फूलदान में बोया था गुलाब..

मेरे जन्म दिन १८ अप्रैल को तुमने मेरे लिए जो किया वो बहुत खास था..
पहले मंदिर फिर दिन भर मस्ती और शाम को
गंगा किनारे नदी में दिए बहाना.. पता था तुम्हे कि क्या पसनद हैं..
उसदिन हमने टॉफी भी बाटी थी हर एक बच्चे को पुरे दिन जो मिला..
सब याद है..

और याद क्यूँ ना हो तुमसे जो जुडी हैं सब बातें..
आज जून २०१३ २४ तारीख सुबह तुम्हारा कॉल आया मिलना मुझे
हम बाइक लेने चलेंगे पापा ने finance करा दि है..
तुम खुश थे. और तुम्हारी खुशी मुझ से..
बाइक ली मंदिर फिर घर..
और फिर पुरे दिन हवा से बातें..
.......

जुलाई २०१३ तारीख ७ कभी नही भूल सकता
कैसे भूलूं नही भूल सकता
तुम tuition से घर जा रहे थे..
और मेरे से बात कर के कहा आज नही सकता कल आऊंगा माँ को लेकर जाना है कंही..
मैंने कहा ठीक है आराम से बाइक चलाना..
तुमने कहा ठीक है..
अच्छा कल मिलता हूँ..
रात ८ बजे तुम्हे कॉल कि तो पापा ने उठाया
मैंने कहा नमस्ते अंकल उन्होंने कहा नमस्ते कैसे हो बेटा अंकल बढिया..
दिव्यंकर कंहा है..
वो admit है tuition आते हुए उसका accident ho gya
अंकल क्या कंहा हो आप लोग अभी..
बेटा सिटी हॉस्पिटल बस थोड़ी देर में देल्ही के लिए निकल रहें हैं..
क्या..??
आँखों में आँसू..
माँ मैं अभी आया
क्या हुआ रो क्यूँ रहा है..
कुछ नही आता हूँ..
जिस हाल में था वैसे ही सिटी अस्पताल गया..
पर तुम्हे देल्ही ले जा चूके थे..
क्या करूँ कंहा जाऊं कुछ समझ नही आरहा था..
अब तो तुम्हारा नॉ भी बंद
अगले दिन घर गया तो लोगों कि भीड़ मै समझ गया तुम्हे नही देख पाता इस हालत में तो घर के एक कोने में खड़ा हो गया..
और तुम्हारे साथ कुछ कदम कि दुरी तय कि..
और वो आखरी पल थे जब मैं तुम्हारे साथ चला था..
........
अभी यंकी नही होता कि तुम नही हो..
तुम तो हर जगह हो जंहा जंहा हमने खूबसूरत पल बिताए..
......
आज एक साल है हो रहा है हमारे अतुल्य प्रेम को..

और मै तय समय से पहले ही पहुंच गया हूँ..
तुम्हारे इंतज़ार में..
कि तुम आओगे..
तुम आओगे और गुद्गुदाओगे..
३१-१२-२०१३
वही तारीख वो ही दिन बस अलग है तो साल..
वो ही स्ट्रीट लाईट का खम्बा और उसपर पतंगे..
मेरे हाथ में तुम्हारे लिए गुलाब..
आज भी मैंने ब्लू शर्ट पहनी है..
तुम्हे पता है अब तो हर रोज़ मैं टॉफी बाटता हूँ
........
आज तुम्हारे लिए कुछ लिख कर लाया हूँ..
सुनाता हूँ रुको..
तुम वापस आजाओ..
फिर ना जाने के लिए..
बेरंग सी है मेरी दुनिया..
कोई रंग तो भर जाओ..
तुम वापस आजाओ..
गुलाब खिलते हैं..
पर महकते नही..
एक उम्मीद का गुलाब फिर से महका जाओ..
तुम वापस आजाओ..
सर्दी बहुत हैं और सर्द हवा भी..
कहोरे में लिपटी ये जमीं भी..
रेजा रेजा है पेड़ों के पत्ते..
सर्द आलम में
ठिठुरी ठिठुरी मेरी आरजू भी कंही..
ये दिसम्बर यँ ही बीत गया..
ये साल आधा तेरे बैगर ही गुजर गया..
दिवाली में तेरे नाम के इंतज़ार के..
कुछ दीप जलाये और बहा दिए गंगा में..
और साथ ही कुछ गुलाब भी..
कि तुम्हारी राह रोशन हो..
कि महकती रहे
उसी महकती राह से रौशनी के अक्स में तुम वापस आजाओ.. “दिव्यंकर”

लाल रंग..!! (२)

ठंडी हवा..
और शाम का ढलता सूरज..
ऐसे में तुमने पकड़ कर मेरे हाथों को..
उठा दिया सजदे में..
और लिख दिया मेरे जिस्म..
मेरी रूह..
मेरे मन..
और सारी कायनात पे..
"लाल रंग" ...... "दिव्यंकर"
.................
 दीपक कि लौ बुझने को थी..
और नींद में आँखे बोझल
पर मेरा मन तन तुम्हारे साथ लिख रहा था..
एक कहानी
या कोई प्रेम गीत
पर जब भी पढता हूँ कल कि तस्वीर को तो उभर आता है
"लाल रंग"...... "दिव्यंकर"

सोचा किया.. "तुझे" विचार किया.. मैंने कई कई बार किया...!!

सोचा किया.. "तुझे" विचार किया.. मैंने कई कई बार किया...!!

सोचा किया,
तुझे
विचार किया,
मैंने कई-कई बार किया,
कैसे कहूं गुज़रे वक़्त को,
मै कैसे कई-कई बार जिया ।

जब शुरू हुआ, कोई ख़ास मिला,
जीने को जैसे आस मिला,
कुछ रंग मिले, कुछ रास मिला,
उमंगों को एहसास मिला,
रूप-सुरूप बहुतेरे,
अपना सा कोई आज मिला,
खास मिला..
गुलाब मिला..
प्यार ओंस बूंद लिए..
सोच किया,
तुझे
विचार किया,
मैंने कई-कई बार किया,
कैसे कहूं गुजरे वक़्त को,
मै कैसे कई-कई बार जिया ॥

साँसों की यूँ बाँधी डोरी,
मोटी की माला सी,
टूटे तो बिखर जाए,
साथ रहे तो सजे रहे,
दिया और बाती सी..
चदन संग पानी सी..

लड़ते-झगड़ते, प्यार पे मरते,
संग-संग बाधा हर तरते,
इक-दूजे को जहान मान कर,
नित अभिनव, श्रद्धा अर्पण त्यों करते,
कभी, बहुत बड़ों सा,
तो कभी बच्चों सा व्यवहार किया,
सोच किया
तुझे,
विचार किया,
मैंने कई-कई बार किया,
कैसे कहूं गुज़रे वक़्त को,
मैं कैसे कई-कई बार जिया "दिव्यंकर"

आगे बढ़ रहा हूँ..!!

आगे बढ़ रहा हूँ..!!

तुम्हारे लिए,
तुम्हारी खुशियों के लिए,
तुम्हारे दिए हुए हौसले को लेकर आगे बढ़ रहा हूँ,
शायद इसी वजह से खुद से लड़ रहा हूँ,
दिल की सभी हसरतों को मार कर,
तुम्हारे लिए आगे बढ़ रहा हूँ ।

जीने मरने की जो कसमें खाई थी,
दुःख सुख में साथ सहने की जो भी रस्मे थी,
रास नहीं आई वक़्त को खुशियाँ वो,
इसलिए, तुम्हारी खुशियों के लिए आगे बढ़ रहा हूँ,
मैं मुस्कुरा रहा हूँ,
तुम्हे खुद से दूर कर के,
और मिटा रहा हूँ,
खुद को धीरे धीरे तुम्हारे लिए..!!
मैं आगे बढ़ रहा हूँ.. "दिव्यंकर"

Monday, 24 March 2014

ऐसी मेरी होली हो...!!

ऐसी मेरी होली हो..!!

कोई रंगे मुझे अपने रंग में..
ऐसी मेरी होली हो..
बाहों में उसकी थोडा बरजोरी हो..
उड़े गुलाल खिले गाल..
होंठों पे मीठी बोली हो..
कोई रंगे मुझे अपने रंग में..
ऐसी मेरी होली हो..
प्रीत मन रंगे..
रंगे रोम रोम मेरी काया..
नैनो से नैना रंगे..
होंठों से रंगे मधुशाला..
बिन पानी के भीग जाऊं..
मै महक बहक जाऊं..
बिन भाँग पिए मोहे चढे नशा..
ऐसी प्रीत में डूबी हो..
कोई रंगे मुझे अपने रंग में..
ऐसी मेरी होली हो.. "दिव्यंकर"

आज सोने का मन है..!!

आज सोने का मन है..!!

सुनो बांट लेते हैं आज
आधी आधी रात
आधा आधा चांद
सुबह हिसाब कर लेंगे
आज की रात

आज की रात
तुम अपने होठों पर थोड़ी सी चुपि रख लेना
मेरा और चाँद का
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"

सुनो बोलनें दो  खामोशियों को
सरकने दो रात को
आहिस्ता आहिस्ता
चांद आता रहे खिड़की से
थोड़ा थोड़ा
बंद किवाड़ों से भी
और साथ ही आती रहे ठंडी हवा
ठंडी हवा लाए साथ अपने रात की रानी की महक..
ऐसे में तुम प्रेम लिप्त तेल में डूबी उंगलियाँ मेरे सर पर फेरों..
और गाओ कोई मधम गीत
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"


सुनो अपने अपने हिस्से के आसमान में
तुम और मैं
कोई टूटता तारा ढूंढते हैं
और मनाते हैं कोई रूठी हुई मन्नत
शायद आज पूरी हो
जो तुम्हारी और मेरे दिल की आरजू है
गुफ्तगू है
पुरे दिन
सूरज सी दहकी  हैं
मेरी और तुम्हारी धड़कनें
ऐसे में
चलो
चांदनी को  निचोड़कर
एक दूसरे के
माथे पर रख देते हैं
शायद तुम्हारी और मेरी गर्म रातों को
थोड़ी ठंडक मिल जाए
और मिल जाए
गर्म सांसों को
आराम आ
की तुम्हे मेरी और मुझे तुम्हारी बाँहों में..
पनाहों में
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"

बिखरने की आदत है,
यूं समेट लो मुझको
कि सहर होने तक
समूचा रहे जिस्म,
साबुत हो रूह
रतजगे बहुत हुए
सिरहाने रोना मत ऐ दोस्त
ख्वाब गीले हो जाएंगे
आज सोने का मन है..!! "दिव्यंकर"