Tuesday, 25 March 2014

ख्वाब..!!

ख्वाब..!! (३)

March 8, 2014 at 10:02am
ख्वाब..!! (३)

अक्सर रुलाते हैं..
जब ये टूट जाते हैं..
........................

आँखों से नोच कर फेंक दिए..
जो तुझे लेकर ख्वाब देखे थे..
उन्हें खुद ही तोड़ दिए..
तेरी खुशी के लिए..
तोडना भी लाज़मी ही था..
तू किसी और की आँखों का ख्वाब है..
और वो तुझे लेकर बहुत पहले से लेकर ख्वाब सजा रहा है..
ऐसे में मैं भी उन्ही ख़्वाबों की इच्छा करूँ..
ये सही नही..
तो तुम खुश रहो..
और तुम और वो दोनों मिलकर एक हसीं ख्वाब देखो..
जो कभी ना टूटे.. "दिव्यंकर"
........

ख्वाबों का क्या है..
हर रात सजते हैं..
मेरी पलकों पर..
और हर भोर बहते हैं हैं..
ख़्वाबों का क्या है..
ये रेत से..
खारे पानी की तरह..
चुभते हैं...
मेरी आँखों में..
और जगा देते हैं..
रुला देते हैं..
कभी हंसा देते हैं..
ख्वाबों का क्या है..
हर रात सजते हैं..
कभी मैं तन्हा..
कभी तेरे संग रह कर भी तन्हा..
तेरे जिक्र में मेरा अक्स ढूंढते हैं..
ख़्वाबों का क्या... "दिव्यंकर"

 

ख्वाब..!! (२)

February 6, 2014 at 8:26pm
ख्वाब..!! (२)
शायद आखों के किसी कोने में छुप कर बैठा था..
मेरे ये हसीं "ख्वाब"
तुम्हे देखा तो छलक पड़ा..
चहरे पर चंचल हंसी के साथ..
तुम से मुझे जो जोड़े रख सकता हैं.. ये वो "ख्वाब" है..
जो तुम भी देखते हो.. पर कहते नही

ये "ख्वाब" है.. एक बार फिर से बच्चपन को जीने का..
ये "ख्वाब" हैं.. एक बार फिर से मचलने का..
ये "ख्वाब" हैं.. सो हुई धड़कन को जगाने का..
ये "ख्वाब" है.. तुम संग एक सदी जीने का..
ये "ख्वाब" है.. रूठने मनाने का..
ये "ख्वाब" हैं.. थोडा जिद्दी होने का..
ये "ख्वाब" हैं.. तुम्हारी मेरी खुशी का.. "दिव्यंकर"

ये ख्वाब हकीकत से बहुत दूर है..पर उम्मीद है कि तुम मैं एक दिन इसे हकीकत बनायेंगे..
और फिर गूंजेंगी.. किलकारियां..
हमारे आशियाने में..
जंहा फिर पल बैठेगा.. एक ख्वाब किसी के उज्वल भविष्य का..


ख्वाब..!!

February 6, 2014 at 12:31pm
मेरा बस यही ख्वाब.. हैं..

तुम्हारा साथ..
एक ऊची इमारत में अपना आशियाँ..
सुबह जब
उस आशियाने कि जब हम खिड्की खोले तो..
दूर तक दिखे
बस नीला रंग..
और बह रही हो ठंडी हवा..
ऐसे में..
तुम मैं खो जाए एक दूसरे कि बातों में..
और गुनगुनाने लगे खामोशियाँ..

शाम गुलाबी हो..
और मैं तेरे लबों से पियूँ शाम कि गर्म चाय..
ऐसे में उस गुलाबी रंग में तू और मैं रंग जाए..
और महक उठे गुलाब जो हमने बोयें थे..
फूलदान में..

रात को छत पर..
तुम मै..
और बस हो तन्हाई...
तारों कि छांव में चाँदनी रात में..
तुम संग प्यार कि थोड़ी सी हो लड़ाई..
रूठना मनाना..
फिर गले लगाना..
प्यार के एहसास में डूब जाना..
जब पड़े चहरे पर धूप करकरारी...
आँखें मलते हुए उठाना..
तुम्हे जगाना..
और प्यार से कहना आज फिर देर हो गई..
ऑफिस के लिए.. "दिव्यंकर"

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