मयूरपंख
February 1, 2014 at 8:03pm
"मयुरपंख"
जितने मेरे दिल के करीब है..
उसी दिल ने जन्मी हैं ये कविता.. आशा है आपके भी दिल तक पहुंचेगी...!!
तुम्हे पता है..
आज भी जब मन उदास होता है तो किताब से निकाल कर देख लेता हूँ.."मयुरपंख"
और कह देता हूँ दिल का हाल..
जैसे तुम हो मेरे सामने और मैं तुमसे बातें कर रहा हूँ..
बातें करते करते खो जाता हूँ
पुरानी यादों में..
.......
कितने भोले थे तुम...
और मासूम भी..
तो नटखट और चंचल भी..
चहरे पर मुस्कान लिए जब भी मुझसे मिलते
तो दिखाते थे.. अपनी जेब से निकाल कर.."मयुरपंख"
और तुमने अपनी हर एक किताब में
हर एक पुस्तक में संजो कर रखा हुआ था "मयुरपंख"
........
याद है वो शाम..
जब
तुम ने मुझे वह मयुरपंख दिखाया...
मुझसे कहां इसे किताब में रखकर रोज प्रणाम करो तो ’मयुर’ बन जायेगा...
मै कितना अच्छा दोस्त था तुम्हांरा फ़िर भी तुमने सिर्फ़ एक बार छुने दिया था...
मानो सचमुच का मयुर था...
मुझे कितनी इर्षा हुई थी...
जिस दिन मेरा जन्मदिन था...मैंने मौका पाते तुमसें वह मयुरपंख मांग लिया...
पर तुमने मुझसे दोस्ती तोड दी...मुझसे?
अब मैंने भी ठान लिया...मुझे वह मयुरपंख चाहिये...
मैंने तुम्हांरी किताब से वह मयुरपंख चुराया...
उसी रात तुम बिमार हुए...बहुत बिमार... हफ़्ताभर दवा लेने के बाद भी ठिक नही हुए...
और इलाज के लिए शहर चले गये... फ़िर लौटे ही नही..
बस लौटी तो एक सजा..
उम्र भर अकेले रहने कि..
......
खबर आई कि तुम अब शहर में ही पढोगे..
क्यूँ कि तुम्हारे पिता जी का वंही तबादला हो गया है..
मेरे होठोंकी मुस्कान जैसे छिन गयी थी...
सिर्फ़ एक चीज थी तुम्हांरा वह ’मयुरपंख’ जिसे देखकर मैं मुस्कुरा लेता...
और तमाम बातें करता
ऐसे में खुद को बस जोड़ लिया दो चीजों से एक कान्हा और दूसरा तुम्हारा "मयुरपंख"
ऐसे में कब किताबों से और कब घर वालों से दूर हो गया पता ही नही चला..
अब मै मयूरपंख और मेरे अधूरे शब्द..
सजने लगे..
ऐसे में घर के पास कान्हा जी का मंदिर..
तो शाम और सुबह उनके चरणों में..
और कभी जब मन बहुत खुश होता तो..
"मयूरपंख"
कान्हाजी के मस्तक पर सजा देता..
और उन्हें देख कर तुम्हे.., तुम्हारे भोले चहरे को याद करता..
और छलक पड़ते आँसू
और बह उठता मैं..
तुम्हे पता है
अपने दिल की बात किससे कहता ...किसको अपना दुखडा सुनाता जब यह सवाल परेशान करता... मैं चली जाता मंदिर ...
तुमसे बातें करना मेरी आदत बनती जा रही थी... और मैं मजाक का विषय...
.......
लोग पागल कहने लगे तो..
घर वालों ने एक कान्हा कि मूर्ति ला दि..
अब मेरी सीमाएं थी..
घर कि छत..
और मेरा कमरा..
और कान्हा...
वही एक मेरा अपना साथी था...
थे तो तुम भी "मयुरपंख" के रूप में..
और बहुत खुश था मैं अपने ’कान्हा’ को देखकर...
तुम्हांरा मयुरपंख अब उनके सर पर विराजमान देख कर...
कभी कभी तुम्हांरा भोलापन याद आजाता...
.......
अब मैंने कापी हाथ में लेके तुमसें की जाने वाली सारी बातें उस कापी में लिखना शुरू किया...
और फ़िर मैं अनायास लिखता चला गया... क्या क्या न लिख डाला मैंने...
ना जाने मेरे जिंदगी के कितने ही उतार चढाव के साक्षी था तुम्हांरा यह ’मयुरपंख’...
........
कल अचानक तुम्हें देखा...
हां..तुम ही तो थे...
वही सांवला रंग और सागर जैसी विशाल भोली आंखे...
जब सामना हुआ तो हिचकिचाहट हुई...
मैंने तो तुम्हें कभी भुलाया ही नही था... पर तुम तो भूल चुके होंगे शायद...
पर नही मेरा नाम पता चलने पर तुमने पुछ ही लिया... ओहो... मैं खुशी को सम्भाल नही पाया..
और छलक पड़ा..
और निकाल कर सामने रख दिया तुम्हारे तुम्हारा "मयूरपंख"
मयुरपंख देखा तो तुमने पुछ ही लिया...
’मैं कितना बुद्दु था ना? मयुरपंख से मयुर बन जायेगा ऐसा सोचा करता था’...
तुम्हें क्या पता इस मयुरपंखने कितना साथ दिया है मेरा...
मेरे जीने की चाहत को हमेशा उजागर किये रखा...
जब भी मैं उदास था मुझे मुस्कुराना सिखाया..तुम्हांरे इस "मयुरपंख" ने......
हां सचमुच...
और कितने भोले थे तुम..
पर आज तक एक सवाल जिसका जवाब तुम थे या "मयूरपंख"
.................................. "दिव्यंकर"

जितने मेरे दिल के करीब है..
उसी दिल ने जन्मी हैं ये कविता.. आशा है आपके भी दिल तक पहुंचेगी...!!
तुम्हे पता है..
आज भी जब मन उदास होता है तो किताब से निकाल कर देख लेता हूँ.."मयुरपंख"
और कह देता हूँ दिल का हाल..
जैसे तुम हो मेरे सामने और मैं तुमसे बातें कर रहा हूँ..
बातें करते करते खो जाता हूँ
पुरानी यादों में..
.......
कितने भोले थे तुम...
और मासूम भी..
तो नटखट और चंचल भी..
चहरे पर मुस्कान लिए जब भी मुझसे मिलते
तो दिखाते थे.. अपनी जेब से निकाल कर.."मयुरपंख"
और तुमने अपनी हर एक किताब में
हर एक पुस्तक में संजो कर रखा हुआ था "मयुरपंख"
........
याद है वो शाम..
जब
तुम ने मुझे वह मयुरपंख दिखाया...
मुझसे कहां इसे किताब में रखकर रोज प्रणाम करो तो ’मयुर’ बन जायेगा...
मै कितना अच्छा दोस्त था तुम्हांरा फ़िर भी तुमने सिर्फ़ एक बार छुने दिया था...
मानो सचमुच का मयुर था...
मुझे कितनी इर्षा हुई थी...
जिस दिन मेरा जन्मदिन था...मैंने मौका पाते तुमसें वह मयुरपंख मांग लिया...
पर तुमने मुझसे दोस्ती तोड दी...मुझसे?
अब मैंने भी ठान लिया...मुझे वह मयुरपंख चाहिये...
मैंने तुम्हांरी किताब से वह मयुरपंख चुराया...
उसी रात तुम बिमार हुए...बहुत बिमार... हफ़्ताभर दवा लेने के बाद भी ठिक नही हुए...
और इलाज के लिए शहर चले गये... फ़िर लौटे ही नही..
बस लौटी तो एक सजा..
उम्र भर अकेले रहने कि..
......
खबर आई कि तुम अब शहर में ही पढोगे..
क्यूँ कि तुम्हारे पिता जी का वंही तबादला हो गया है..
मेरे होठोंकी मुस्कान जैसे छिन गयी थी...
सिर्फ़ एक चीज थी तुम्हांरा वह ’मयुरपंख’ जिसे देखकर मैं मुस्कुरा लेता...
और तमाम बातें करता
ऐसे में खुद को बस जोड़ लिया दो चीजों से एक कान्हा और दूसरा तुम्हारा "मयुरपंख"
ऐसे में कब किताबों से और कब घर वालों से दूर हो गया पता ही नही चला..
अब मै मयूरपंख और मेरे अधूरे शब्द..
सजने लगे..
ऐसे में घर के पास कान्हा जी का मंदिर..
तो शाम और सुबह उनके चरणों में..
और कभी जब मन बहुत खुश होता तो..
"मयूरपंख"
कान्हाजी के मस्तक पर सजा देता..
और उन्हें देख कर तुम्हे.., तुम्हारे भोले चहरे को याद करता..
और छलक पड़ते आँसू
और बह उठता मैं..
तुम्हे पता है
अपने दिल की बात किससे कहता ...किसको अपना दुखडा सुनाता जब यह सवाल परेशान करता... मैं चली जाता मंदिर ...
तुमसे बातें करना मेरी आदत बनती जा रही थी... और मैं मजाक का विषय...
.......
लोग पागल कहने लगे तो..
घर वालों ने एक कान्हा कि मूर्ति ला दि..
अब मेरी सीमाएं थी..
घर कि छत..
और मेरा कमरा..
और कान्हा...
वही एक मेरा अपना साथी था...
थे तो तुम भी "मयुरपंख" के रूप में..
और बहुत खुश था मैं अपने ’कान्हा’ को देखकर...
तुम्हांरा मयुरपंख अब उनके सर पर विराजमान देख कर...
कभी कभी तुम्हांरा भोलापन याद आजाता...
.......
अब मैंने कापी हाथ में लेके तुमसें की जाने वाली सारी बातें उस कापी में लिखना शुरू किया...
और फ़िर मैं अनायास लिखता चला गया... क्या क्या न लिख डाला मैंने...
ना जाने मेरे जिंदगी के कितने ही उतार चढाव के साक्षी था तुम्हांरा यह ’मयुरपंख’...
........
कल अचानक तुम्हें देखा...
हां..तुम ही तो थे...
वही सांवला रंग और सागर जैसी विशाल भोली आंखे...
जब सामना हुआ तो हिचकिचाहट हुई...
मैंने तो तुम्हें कभी भुलाया ही नही था... पर तुम तो भूल चुके होंगे शायद...
पर नही मेरा नाम पता चलने पर तुमने पुछ ही लिया... ओहो... मैं खुशी को सम्भाल नही पाया..
और छलक पड़ा..
और निकाल कर सामने रख दिया तुम्हारे तुम्हारा "मयूरपंख"
मयुरपंख देखा तो तुमने पुछ ही लिया...
’मैं कितना बुद्दु था ना? मयुरपंख से मयुर बन जायेगा ऐसा सोचा करता था’...
तुम्हें क्या पता इस मयुरपंखने कितना साथ दिया है मेरा...
मेरे जीने की चाहत को हमेशा उजागर किये रखा...
जब भी मैं उदास था मुझे मुस्कुराना सिखाया..तुम्हांरे इस "मयुरपंख" ने......
हां सचमुच...
और कितने भोले थे तुम..
पर आज तक एक सवाल जिसका जवाब तुम थे या "मयूरपंख"
.................................. "दिव्यंकर"

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