बर्फ...!! (३)
January 28, 2014 at 7:22am
कल रात तेरी यादों कि धुंध..इतनी गहरी थी कि..
मेरी आँखों से बरसात तो हो नही पाई..
पर कुछ बूंदे ठहर कर रह गई..
मेरी पलकों पर..
ऐसे में खाली और भारी मन के साथ..
सुबह उठ कर जो एक सफर इख्तियार किया..
तुझसे मिलने का..
तभी याद आई वो कल रात कि बात..
जो तुमने बोली थी..
वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है..
तुम भी बदल जाओ
और छोड़ दो ये चाहतों का सिलसिला..
जिसके कोई मायने नही..
जिसकी कोई मंजिल नही..
तेरा और मेरा कोई वास्ता नही..
ये वो सफर है जिसे हम कुछ दूर तक साथ तो चल सकते हैं..
पर वक्त के एक अहम पड़ाव पर हम बिछड़ जायेंगे..
या तो ये रस्मे मोहब्बत हमे दूर कर देगी..
या फिर समाज कि रिवायतें..
इससे पहले ऐसा कुछ हो..
या हम एक दूसरे कि मोहब्बत में इतने मगरूर हो जाए..
या बंध जाए एक दूसरे से मोटी और माला कि तरह..
कि अगर जुदा हों तो बिखर जाए..
और सम्भाल भी ना पाए..
इससे अच्छा है पहले ही सम्भल जाए और छोड़ दें एक दूसरे का साथ..
और जमा लें एक दूसरे के एहसास को बर्फ कि तरह..
कि अगर ये कभी पिघले भी तो बह जाए.. सारे एहसास आँसुओं.. में "दिव्यंकर"
ऐसे में मैं सुनसान सफर पर चल तो रहा था..
पर जाऊं किधर ये सोच कर चौराहे पर रुक गया..एक डगर तेरी और..एक वापस लौटने कि..
एक नए सफर पर चलने कि..
पर कंही ना कंही जो राह मुझ तक आती है वो तुझ तक भी तो जाती होगी..
तभी पड़ने लगी..
बर्फ.. जिसने हर राह तो सफेद कर दिया.. "पाक"
और मन में इस विश्वास के साथ चलने लगा एक नई डगर पर कि कभी ना कभी तो तुम तक पहुंचेगी..
और जब देखों के मुझे बरसों बाद अपने सामने तो पिघल उठेगी.. तुम्हारे कदमों पर जो बर्फ जम गई है..
और तुम मेरा हाथ थम कर कहोगे चलो एक बार फिर साथ चलें..
उस सफर पर जंहा बर्फ ना पडती हो..
खामोशियाँ ना हो..
जंहा बस तुम मै और प्यार हो.. "दिव्यंकर"
बर्फ...!! (२)
January 25, 2014 at 10:03am
मेरे जज्बात और एहसास
इस ठंड में जम गए हैं बर्फ कि तरह..
हर रात बस होती है तो धुंध
जो सुबह तक छटने का नाम नही लेती..
और दूर तक नही दिखता कोई उम्मीद का सूरज..
ऐसे में बर्फ पर पड़े तुम्हारे कदमो के निशाँ जो मुझसे दूर जाते दिखते हैं..
पर एक आस है कभी तो ये बर्फ पिघलेगी
और मीट जायेंगी ये सारी गलतफहमियाँ..
फिर सब कुछ पहले जैसा होगा..
वही शोर वही खुशबू और वही नजारे..
पर जिस तरह इस बार कि बर्फ बिछी है..
और खामोशियों कि गूंज हर तरफ हर और से उठ कर
बस यही कहती हैं..
अगर ये बर्फ पिघेलेगी भी तो सब कुछ बहा ले जायेंगी
वो तमाम यादें जो दफन हैं इनके नीचे..
तो बस एक उम्मीद ये बर्फ भी पिघले और तुम्हारे कदमों कि आहट हो
नया दिन हो.. और धूप हो..
बरसात हो..
और पड रही हो चाहत कि बर्फ.. जिसमे सुलग कर तुम ना जा पाओ..
मुझसे दूर "दिव्यंकर"
इस ठंड में जम गए हैं बर्फ कि तरह..
हर रात बस होती है तो धुंध
जो सुबह तक छटने का नाम नही लेती..
और दूर तक नही दिखता कोई उम्मीद का सूरज..
ऐसे में बर्फ पर पड़े तुम्हारे कदमो के निशाँ जो मुझसे दूर जाते दिखते हैं..
पर एक आस है कभी तो ये बर्फ पिघलेगी
और मीट जायेंगी ये सारी गलतफहमियाँ..
फिर सब कुछ पहले जैसा होगा..
वही शोर वही खुशबू और वही नजारे..
पर जिस तरह इस बार कि बर्फ बिछी है..
और खामोशियों कि गूंज हर तरफ हर और से उठ कर
बस यही कहती हैं..
अगर ये बर्फ पिघेलेगी भी तो सब कुछ बहा ले जायेंगी
वो तमाम यादें जो दफन हैं इनके नीचे..
तो बस एक उम्मीद ये बर्फ भी पिघले और तुम्हारे कदमों कि आहट हो
नया दिन हो.. और धूप हो..
बरसात हो..
और पड रही हो चाहत कि बर्फ.. जिसमे सुलग कर तुम ना जा पाओ..
मुझसे दूर "दिव्यंकर"
बर्फ...!!(१)

बर्फ जमने लगी है.
तेरे मेरे रिश्ते में
और मीलों तक बिछ गई है..
खामोशियों कि सफेद चादर..
ना तुम तक कोई सदा पहुंचती हैं..
ना मुझ तक कोई आती है..
और अगर आती भी हैं तो
ठंडी आहें..
धुएँ में लिपट कर.. "दिव्यंकर"
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