Sunday, 24 November 2013

बचपन यूँ बीत गया.........!!

बचपन यूँ बीत  गया......!!

यादों कि गठरी जब खोली तो पाया.. "मेरा बचपन यूँ बीत  गया.."
एक पल में सब कैसे बदल गया..
वो कार वो साइकल वो वो टुटा हुआ बला..
कमरे के एक कौने में मुझ से चुप कर बैठी गेंद..
वो A B C D वो अ आ  इ ई
वो बचपन के खेल खिलौने और साथी सब पीछे कंहा छुट गया...
बचपन यूँ बीत गया.......!!

वो कहानी रात कि..
वो बात चाँद कि..
वो छुटियों का गिनना..
जिद्द करना..
वो आइसक्रीम
वो मीठी-खट्टी गोली..
वो अमुरुद कि डाल
स्कूल से आते हुए..
लोगों के घरों कि घंटी..
बजाना वो शोर मचाना..
कब खामोशियों में तबदील हो गया..
बचपन यूँ बीत गया.........!!

पापा का कंधा..
माँ कि गोद..
भाई का लडना..
वो दीदी से नोक झोक..
वो अपनी ही टोली..
एक अलग ही होली..
दशहरा दिवाली..
मेले कि रौनक..
आज कि
चका चौंध में कुछ धुंधला हो गया..
बचपन यूँ बीत गया.........!!

यादें काँच सी... :'(

ये कविता उन्ही जख्मी लम्हों कि दास्ताँ.. और लिख भी रहा हूँ जख्मी हाथों से...

वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है..
शायद हाँ..
पर याद है जो वंही रह जाती है..
आज सुबह फिर वक्त के चिराग को हवा मिल गई और धुधली यादें ताज़ा हो गई..
एक पुराने जख्म कि तरह..

........
आज सुबह हाथों से..
शीशा टूट गया...
टूट के बिखर गया..
टूटे हुए मंजर में..
खुद देख रहा था...
मै खुद अंदर से टुटा हुआ महसूस कर रहा था...
एक पल ठहर गया..
फिर बिखरे काँच को..
समेटने लगा..
समेटते समेटते एक टुकड़ा हाथों में चुभ गया...
और खून बहने लगा..
तभी याद आई वो शाम जब मै छत पर था और उससे बातें कर रहा था..
और चाय का लुफ्त उठा रहा था..
तभी हाथों से प्याला छुट गया..
और काँच बिखर गया..
मै उसे समेटने लगा.. हाथ मै टुकड़ा चुभा दो दर्द से आवाज़ निकल पड़ी..
क्या हुआ..
चिल्लाए क्यूँ..
अरे कुछ नही काँच चुभ गया..
देख कर काम नही कर सकते और हातों से क्यूँ उठया..
चलो छोडो.. हटो वंहा से..
अरे कुछ नही हुआ.. बस जरा सा लगा है..
ठीक हो जाएगा..
कहा ना हटो वंहा से..
अरे तुम भी एक काँच ही तो चुभा है..
तभी दुबारा.. एक और टुकड़ा चुभ गया
पहले वाले से ज्यादा...
मत मनो मेरी बात
बस अपने मन कि करो..
... अच्छा ना अब नही करता पर किसी और को लग गया तो..
रुको एक तरफ कर देता हूँ...
एक बात कहूँ.. तुम्हारे लिए ऐसे कई जख्म सह
सकता हूँ..
मै काटों से लेकर तपती रेत पर चल सकता हूँ..
कहो तो अभी चलूं...
तुम पागल हो.. सच में..
और मै हंस दिया हाँ वो तो हूँ..
सुनो मै सच में पागल हूँ...
एक बात और इस काँच के जख्म तो भर जायेंगे... पर शायद तुमने कभी कोई जख्म दिया तो नही भरेंगे..
और वक्त के साथ उभर आयेंगे.. :'(
आज वो ही जख्म उभर आए.. :'(
चोट हाथ पर लगी पर दर्द तो दिल में हुआ... :'(

पत्र.. (तेरे नाम)

"प्रेम पत्र..... तेरे नाम..."
कभी मैंने भी एक प्रेम पत्र लिखा था...
और छुपा दिया था किताब में.. और सोचा था जब हम एक दूसरे से तारुफ होंगे तब उसे दूँगा
और कहूँगा कि घर जाके पढ़ना.. पर शायद हमारी किस्मत में मुलाक़ात ही नही थी...
और मेरे वो जज्बात बस लाल श्याही कि तरह लाल ही रह गए... और वक्त के साथ धुंधले पड गए...
आज जब वो प्रेम पत्र हाथ लगा तो आँखों से एक जल धारा बह निकली.. और फिर पुरानी बातें ताज़ा हो गई...
उसी प्रेम पत्र कि एक छवि... आपके सामने...
मेरे शब्द उस तक तो नही पहुंचे पर शायद आप तक पहुंच जाए.....
आज हाथ में वो खत लगा..
जो तुम्हे लिखा था एक रोज़..
अपने अरमान लिखे थे.. जज्बात लिखे थे..
दिन रात और मैंने शाम लिखे थे..

मैंने अपने पल तेरे नाम लिखे थे..
तुझसे मिलने कि चाहत में..
इंतज़ार लिखा था..

अकेले कैसे हंसते हैं हम..
या अकेले कैसे रोते हैं..

तेरे रूठ जाने पर दिल कैसे टूट जाता है..
तेरे मनाने को एक नया ख्याल कैसे दिल में उतर आता है..
तुझसे बातें करते हुए दिल कैसे बच्चा बन जाता है..
मैंने मोहब्बत तमाम लिखी..
थोड़ी तकरार लिखी..
एक गुलाब और फिर बातें हज़ार लिखी..
तुझसे मिलने कि आरजू..
अपना हाल लिखा..
तुम्हारा हाल पूछा.., घर में सब कैसे हैं..
माँ पापा को प्रणाम लिखा..
मैंने तुम्हे के पत्र लिखा..
प्रेम पत्र लिखा.
अपने दिल का हाल लिखा... “दिव्यंकर”

शाम मै.. और सामने वाली छत...

ये कविता शाम के उन हसीं लम्हों कि कहानी है जो मेरे साथ हर शाम घटती है...
....
मै. छत और ढलता सूरज..
शाम गुलाबी लाल सूरज..
चिड़ियों का झुण्ड और बहती चंचल मंद पवन..
ऐसे में
सामने वाली छत और छत पर वो..
वो.. देखता है बादल में छुपे चाँद कि तरह..
मुस्कुराता है..
एक भर दीदार के बाद..
फिर नज़र नीचे किए..
वो यूँ देखता है बार बार..
मुझे हँसी आ जाती और शर्मा कर चला जाता है...
जाते जाते पलट कर फिर..
यूँ देख जाता है.. और कई सवाल पूछ जाता हैं..
...
शाम चाय कि चुस्कियां..
और छत पर टहलना
यूँ समाने कि छत.. पर नज़र जाना..
और देखना कि कोई देख रहा है..
फिर वही सिलसिला
सामने वाली छत और छत पर वो..
वो.. देखता है बादल में छुपे चाँद कि तरह..
मुस्कुराता है..
एक भर दीदार के बाद..
फिर नज़र नीचे किए..
वो यूँ देखता है बार बार..
मुझे हँसी आ जाती और शर्मा कर चला जाता है...
जाते जाते पलट कर फिर..
यूँ देख जाता है.. और कई सवाल पूछ जाता हैं..
....
इस सिलसिले को दो महिने से ऊपर हो चूके हैं..
अब बात हो जाती हैं नजरों से..
पर सवालों के कई जवाब अभी अधूरें हैं....??
....
कल शाम आस पास कि छत पर कोई नही..
ऐसे में वो चिलाया..
नाम नही जानते तो..
सुनो..
सुनो..
मैंने सुना इधर उधर देखा..
वो था छत पर..
और कुछ कहने कि कोशिश कर रहा था..
मै हंस दिया..
और वो फिर वो रोज़ कि तरह
शर्मा कर चला गया..
पर आज उसकी आँखों में गुस्सा था...
पर ओंठों पर हँसी...
सवाल तो कई जन्मे पर
जवाब ढूढ ना बाकी है...
..
शायद अब शाम होगी..
मै हूँगा और वो..
और फिर तमाम बातें.. सवाल जवाब... "दिव्यंकर"

करवा चौथ..!!

करवा चौथ..!!

 

..करवा चौथ..
ये कविता  किसी के अधूरे सपनों कि, तो किसी के मुकमल मोहब्बत कि..दास्ताँ हैं.. उस रात कि जिस का हर प्रेमी युगल को इन्तेज्ज़र रहता हैं..


एक हसीं रात..
चौथ का चाँद..
चिलमन कि आड़ से..
जलते दियों के प्रकाश में..
उस चाँद के नूर में..
तेरा दीदार..

एक ख्वाब था..
ख्वाब रह गया..
मेरा हर सपना..
आँसुओं के संग बह गया..

पर तेरी लम्बी उम्र..
मेरी पाक मोहब्बत..
जिस्म कि नही रूह कि तलब..
मै अपना वादा निभाऊंगा..
इस बार तेरी यादों के संग..
अधूरी मुलाकातों के संग
तेरी बातों के संग..
वो प्यार भरी तकरारों में..
यूँ रूठते मनाते जज्बातों में..
मैं करवा चौथ मनाऊंगा..
अपनी मोहब्बत के लिए
खुद के लिए..
मैं भीगी पलकों से..
उस हसीं रात..
चौथ का चाँद..
चिलमन कि आड़ से..
जलते दियों के प्रकाश में..
उस चाँद के नूर में..
तेरा दीदार..
को रात भर चाँद तकते तकते तुझे याद करते करते..
छत पर ही सो जाऊंगा..
ओंस कि बूंद से नहा कर..
फिर तेरे स्पर्श के एहसास से खिल जाऊंगा..
तेरे इंतज़ार कि उम्मीद में..        "दिवयंकर"

kaash..!!

Kash tum DEKH sakty…
Tuty huy dil ko


Behty huy ansuon ko
Is adhury mösam ko
Kash Tum PARH sakty…
Mery hathon ki lakeron ko
Khawabon ki taberon ko
Dil k afsanon ko
Kash Tum SÅMJH Sakty…
Mery lafzon ki gehrai ko
Honton ki sachai ko
Mehfil ki tanhai ko
Kash tum JÖRR sakty…
Iss DIL ko.. ..
Iss RISHTY ko.. ..
Iss WADY ko.. ..
Lekin ye soch kr khamosh ho jata hun.. ..
KASH .. .. Tum JAN sakty is MOHABAT Ko……….KASH
KAASH..?? !!!!!

ये प्यार था या कुछ और था...

अभी कॉल आया.. था..
बीते कल का..
कह रहा था.. रस्मे मोहब्बत कभी थी ही नही तुमसे...
वो मेरा वास्ता ही नही था.. कभी इबादत जनून-ए-इश्क से
फिर भी तुमसे प्यार किया...
मजबूरी थी
या मेरी बेवफाई
इसे तुम जो भी समझो..
पर दूर जाना था तुमसे...
मै दूर हूँ..
तुम भी आगे बढ़ जाना...
.........
नादाँ इबादत होती है..
किसे मोहब्बत जिंदगी होती है..
जिस सोच में तुम शामिल हो..
जिस दिल में तुम रहते हो..
खुद से कई बार लड़ता हूँ..
मै मरता पर उन हसीं लम्हों में जिया करता हूँ..
मै आगे बढ़ नही सकता..
और पीछे हट नही सकता..
............
तेरी रजा थी..
या उस कि सज़ा..
किस्मत में
अब मै हूँ..
तू है और तन्हाई है..... "दिव्यंकर"