Tuesday, 25 March 2014

लाल रंग..!! (२)

ठंडी हवा..
और शाम का ढलता सूरज..
ऐसे में तुमने पकड़ कर मेरे हाथों को..
उठा दिया सजदे में..
और लिख दिया मेरे जिस्म..
मेरी रूह..
मेरे मन..
और सारी कायनात पे..
"लाल रंग" ...... "दिव्यंकर"
.................
 दीपक कि लौ बुझने को थी..
और नींद में आँखे बोझल
पर मेरा मन तन तुम्हारे साथ लिख रहा था..
एक कहानी
या कोई प्रेम गीत
पर जब भी पढता हूँ कल कि तस्वीर को तो उभर आता है
"लाल रंग"...... "दिव्यंकर"

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