Friday, 28 June 2013

तन्हा.. कब तक


एक शाम तन्हा
डूबता सूरज तन्हा
लौटते पंछियों के झुण्ड में
बिछडा हुआ कोई साथी तन्हा
ऐसे उदासी मंजर में

हाथों में चलती कलम
कलम से निकली श्याही
श्याही  के हर बोल तन्हा..
तन्हा तो खुद था वो कागज
वो ही कागज जिस पर लिखातेरा नाम पता तन्हा
तेरे नाम पते के संग
मेरे कई सवाल तन्हा
जिस डाकिये को सौपा खत
दुनिया कि भीड़ में वो खुद तन्हा
दर-ब-दर भटकता पूछता है
तन्हा पता..
ऐसे में कई पते तन्हा..
और
मेरे सवाली खत में तेरे जवाबी इतेज़ार के दिन तन्हा...एक शाम तन्हा....
....
एक रात तन्हा
करवटों के आलम में मेरी नींदें तन्हा
बिस्तरों पर पड़ी सिलवटें
सिलवटों के हर अयाम तन्हा..
ऐसे में चाँद तन्हा
उनको तकती मेरी आँखें और आखों से गिरते अश्रु तन्हा
कुछ पुराने मंजर.. मंजर भी ऐसे जो तन्हा
आए याद तो मुझे भी कर के गए तन्हा
मै तन्हा रात तन्हा
तन्हाइयों के आलम में खुली आँखों में ख्वाब तन्हा
ख्वाब भी ऐसे जो टूटे
जब टूटे तो बिखरे
बिखरने पर हर मोती तन्हा..
ऐसे में मेरा हर ख्वाब तन्हा..
....


सुबह नींद के बोझ से भरी आखें तन्हा
कानो में पड़ते चिड़ियों के मधुर स्वर.. उन स्वरों कि झंकार में हर सुर तन्हा
हवा कि सर-सरा हट से ह्लिते पत्ते तन्हा
फूलों पे बैठता मंडराता भँवरा तन्हा
फूलों कि महक से अंतर मन तन्हा..
और ऐसे में मै तन्हा..
कब तक

Wednesday, 26 June 2013

शाम और तुम..

जब सूरज ढलता.. तुमसे मिलने कि आस का दीपक जलता है..
तुम मिलते नही कंही तो मेरे ख्यालों के सोच के आईने में तुम उभर आते हो धुंधली तस्वीर के साथ...
और याद आतें हैं वो सब वादे जो हमने एक दूसरे के साथ किए थे..
और उसी सोच-ए-ख्याल में कुछ शब्द जो मेरे जहन में उठते हैं..
उनको लिख लेता हूँ...
........................................
बारिश थी.., गुलाब था...
मैं तन्हा और शाम का इंतज़ार था..
तेरे ख्यालों कि गुलाबी धूप में..
मेरे रुखसार का रंग भी कुछ लाल था..
आँखों में शबनम के मोती
तो पुरानी यादों कि गर्म हवा का साथ था..
बारिश थी.. गुलाब था...
पुराने msgs पढते हुए
खुद से ही बतलाते हुए..
सारी बातों का जिक्र आज था..
वो तमाम वादें..
वो तमाम कसमें..
सब ख़ाक था..
बारिश थी.., गुलाब था..
और आखों में सैलाब था..
(
हम जिसे गा नही सकते
वक्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया...)..
"दिव्यंकर"
...............................................................
कल वो ही शाम थी..
वो ही मंजर
वो ही लौटते हुए पंछियों के झुण्ड
मै भी वंही था..
पर तुम नही थे..
होते भी कैसे..
तुम हाथ छुडा कर आगे बढ़ गए..
और लिख गए मेरी किस्मत..
में डूबता हुआ सूरज.. काली यादों कि घनेरी रात..
और अश्कों से बरसात..
और उदास वीरान शाम........ "दिव्यंकर"

...................................................................
कल मज़ारे शाम पर फिर वही गज़ल सुनी
मधम दीपक कि लौ में जलते हुए
पतिंगे कि फरियाद सुनी..
सुलगते अरमानो कि बस्ती में..
गड़े दीवानों कि बात सुनी.
" मोहब्बत पाक नही..
मोहब्बत में अब वो बात नही..
मोहब्बत अब आम है..
दिल कि नही जिस्म कि बात है..
मोहब्बत एक हँसी मजाक है..
हीर-राँझा लैला-मजनूँ ये सब बकवास है..
अब नही किसी को किसी से सच्चा प्यार है..
ये खेल खेल ऐसा जिसमे दिलों का कारोबार है...." "दिव्यंकर"

कल रात चाँद रुसवा हो गया..

कल रात चाँद रुसवा हो गया..
किसी नज़र का शिकार हो गया..
कल रात चाँद रुसवा... रुसवा हो गया...

महफिल आम थी..
कुछ तो बात थी..
तन्हाइयों के साथ.. मुश्किलों भरी रात थी..
ऐसे में एक हम साया हो गया..
.................................... कल रात चाँद रुसवा हो गया..
किसी नज़र का शिकार हो गया..

गज़ल में बात थी..
शायरी के साथ थी..
सरगम का लहज़ा तो.... रागे तर्नुम.. में..
ज़िक्रे हजार हो गया...
..................................कल रात चाँद रुसवा हो गया ..
किसी नज़र का शिकार हो गया..

साकी.. तमाम..
जाम के साथ...
फिर भी जो छलका.. आँखों.. से मैकदा ...
हिजरे.. लाख पैमाने..
का वो एक जाम हो गया..
.................................. कल रात चाँद रुसवा हो गया..
किसी नज़र ...
नज़र.. हाँ.. नज़र का शिकार हो गया..
कल रात चाँद.. रुसवा.. हो गया....

अधूरे लिखे शब्द...

खुद के बारे में कहूँ तो बस इतना ही काफी है .. " अधूरे  लिखे शब्द "

मेरा ये ब्लॉग मेरे  जीवन के उस पहलू  को दर्शाता है जिसे समाज कभी स्वीकार नही करता..
जो समाज कि नज़र में एक अपराध है या यूँ कि व्यर्थ है..

प्रेम समाज कि नजरों में हमेशा ही दंडनीय रहा है.. और फिर अगर ये ही प्रेम "homosexuality" पर आधारित हो तो सवाल और उठते हैं..!! बस अपने जीवन के उसी पहलू को दर्शाने कि कोशिश
"अधूरी लिखी कहानियों का कोई शीर्षक नही होता"