Wednesday, 17 July 2013

बार्चों पर बैठे कबूतर..(प्रेमी युगल ) २

सुबह के पांच बजे होंगे..मै उठ के छत पर गया था.. शांत वातावरण में बस पत्तों कि सरसराहट थी...और साथ ही कबूतर के जोड़े कि गुटरगू...सच आनंद मयी अनुभूतिमैं ठीक उसी जगह आकर खड़ा होगया जंहा से आवाज़ आ रही थी..शांत होकर उनको सुनने लगा..उनकी उस गुटरगू में चंचलता का अनुभव हो रहा था..जैसे वो एक दूसरे को छेड रहे हो या सता रहें हो..या फिर खूब जोर से हंस रहें हो... आवज़ थोड़ी मधम हो गयी.. मेरे मन उत्सुकता कि ऐसा क्यूँ..देखा तो वो अपने घरौंदे से मेरी तरफ झांक रहे थे..शायद उन्हें अनुभूति हो गई थी मेरे होने कि..तभी उनकी मेरी निगाहें टकराई..उनकी निगाहों में आक्रोश था और साथ ही सवाल..यंहा क्या देख रहे हो....??कभी देखा नही है... क्या ??उस जन्म में तो चैन से रहने नही दिया अब इस जन्म में भी चैन नही हैं.. इन लोगों को...मेरी निगाहें झुक गई..पर मैंने भी जवाब दिया.. मै प्रेम को..महसूस कर रहा था..इस वातावरण में ओंस से भीगे पत्ते और मंद पवन..उस पर आपका उल्लास खींच लाया मुझे इधर..मै खुद को रोक नही पाया...!!कैसे रोकता प्रेम मेरी कमजोरी है.. और ये विषय मुझे अति प्रिय..प्रकृति भरपूर सराबोर है प्रेम से..बस उसी को ढुंढने कि कोशिश करता हूँ..और जंहा दिख या मिल जाता है मै वंहा पहुंच जाता हूँ..उसे महसूस करने...तो उनकी उसुकता भरी निगाहों में फिर एक प्रश्न... यंहा क्या महसूस किया..मैंने यंहा चंचलता देखि...तकरार,
रूठना मनाना.. और प्रेम जो आप दोनों में अतुल्य है...ना दुनिया कि फ़िक्र हैं..ना जमाने का डर...और ना ही किसी बात का गम...उन्हें एक साथ उतेजित होकर गुटरगू किया और मै सहर गया.. पूछा ये क्या..उन्होंने का..दुनिया का डर नही हाँ ना जमाने कि फिक्र है..पर गम बहुत है..प्रेम आज भी एक सवाल लिए हुए है...इस में कई मर्यादाएं हैं..तो समाज कि रूढई वादी सोच है...प्रेम मर्यादा में होना चाहिए... पर समाज कि सोच बदलनी चाहिए...
तभी माँ ने आवाज़ लगाईकि चाय बन गई है आजा...और मैंने वो सील सिला वंही खत्म किया...उनसे आज्ञा लि..और वापस आज्ञा......कई सवालों को अनसुलझाये

बरसात...( भीगे लम्हे )...!!

बरसात ( भीगे लम्हे )
प्रेम कि वो फुहार जिसमे भीगना तो सब चाहते हैं.. पर घबराते हैं..
उसी प्रेम कि फुहार में डरते डरते मै भी भीग गया...!!
और अतृप्त मन के साथ रह गया बरसात के उन भीगे लम्हों में !

उसी अतृप्त मन  को लिखने कि एक कोशिश
....................................
प्रेम जब तक दूर था..
मै खुद के पास था..
जब तुम प्रेम रूपी नौका पे सवार होकर मेरे पास आए..
अपना हाथ मेरी तरफ बढाए
ऐसे में तुमको थाम लिया..
रिश्ता दोस्ती का तुमसे मान लिया..
हर पल साथ थे
हमारे  लिए
क्या दुख क्या सुख
हम एक दूजे के पास जो थे
मेरी गज़ल तेरे साज़ थे..
लहजा शायरी का और बातें तेरी थी..
दोस्ती से कुछ ज्यादा थे तुम
तभी जब पास नही तो बहुत दूर लगते थे..
ऐसे आखें बंद कर के जो सोचूं तुम्हे फिर तुम्ही तुम दिखते थे..
कब यूँ हम करीब आगए..
लोगों कि नज़र में भी आगए..
शक था तमाम पर खुद को संभाला भी था लाख..
पता था गलत है..
पर दिल मजबूर है...
हम बेबस थे लाचार थे..
पर निष्ठुर दुनिया  के आगे बहुत मजबूर थे..
प्रेम एक गम्भीर विषय है..
इस पर चर्चा तो सभी करते हैं पर सच कहूँ करने से डरते हैं..
और डरते डरते हम भी कर बैठे प्रेम..
एक दूजे से..
.... एक दूसरे को समझते थे.., शायद खुद से बेहतर जान ने लगे थे.. या यूँ कि..
एक दूसरे का ख्याल बहुत बेहतर ढंग से रखते थे..
शायद येही प्रेम हैं.. हाँ यंही है..
जंहा जज्बात बयाँ होते हैं.. निगाहों से...
जंहा बिना बोले ही सामने वाला आपकी हर बात समझ जाता है..
समझ जाता है आपके दिल का हाल...
या सासों कि रफ्तार से आपके अंदर चलने वाली उथल पुथल..
... वो भी समझता था मेरे हर भाव को चहरे के..
मुस्कुराहट का राज़ या बातों में चंचलता कि बात..
और मै उसके..
पर..
प्रेम कि कुछ कहानियाँ कभी पूरी नही होती..
ठीक उसी तरह जिस तरह हम बरसात में हथेली को फैलाए खड़े हो जाते हैं.. हथेली भीग तो जाती है..
पर बारिश कि बूदें मुठी बंद करने पर फिसल जाती है..
उसी तरह हमारा प्रेम भी एक दूसरे के दिल से फिसल गया..
या यूँ कि हमे ये फैसला लेना पड़ा वक्त को देखते हुए...
और साथ ही बहुत सारे फैसले..
जो ना चाहते हुए भी लिए..
क्यूँ ना लेते बरसात जब अधिक हो जाती है तो कीचड का रूप ले लेती है..
और सड़ने गलने लगते हैं.. उस मिट्टी में उपजे पुष्प..
हम अपने प्रेम रूपी पुष्प का ये ह्श्ल नही देखना चाहते थे..


"बार्चों पर बैठे कबूतर (प्रेमी युगल)"

ये कविता..
वैसे तो कुछ खास नही पर प्रेम कि चासनी में डूबे उस प्रेमी युगल कि बातें हैं.. जिन्हें "लव बर्ड्स" भी कहा जाता है...
तो पेश हैं उनकी अंदाज़े गुफ्तगू.. मेरे लहजे में...
......
हे सुनो.. आओ.. आज दूर तक उड़ के आतें हैं...
नीले आसमान के बिम्ब का अंत ढूँढ के आते हैं..
याद है.. वो शाम जब मैंने कहा था.. हम प्रेमी उन्मुक्त गगन के..
और तुम खिलखिला के हंस पड़ी थी..
चलों आज उस गुलाबी हँसी से एक भोर जगाते हैं..
कैसे भूल सकती हूँ वो शाम या वो लम्हात या वो गुजरे हुए साल..
मुझे तो आज भी याद हैं..
(एक सदी जो बीत चुकी है... उस इतिहास के पन्ने हवा के झोंको से फिर खुल जाते हैं...
और वो दोनों पुरानी यादों में खो जाते हैं..)

मै रोज़ सुबह पार्क में आती थी..
आते तो तुम भी थे...
पर शायद वो दिन हमारी मुलाक़ात के लिए बना था..
तभी तो उसदिन सब कुछ अलग अलग लग रहा था..
हवा में शालीनता होते हुए भी चंचलता थी..
और
बारिश कि फुहार साथ में हर तरफ महकते हुए गुलाब...
हाँ याद है मुझे.. तुम्हारा वो भीगा चेहरा...
भिखरी हुई जुल्फे.. और तुम्हारे होंठों पे साज़ एक नई का ..
उस धुन में मै खो गया.. था और ना चाहते हुए भी तुम्हारे पास आगया..
और जब तुमने अपने हाथों से अपने बिखरे बालों को हटाते हुए मुझे एक अलग अंदाज़ में देखा...
मै घबरा गया... और आखें नीचे चला गया...
और सच बताऊं.. मै बहुत हँसी थी.. तुम्हे इस कद्र देख कर...
......
याद है वो अगला दिन जब तुमने झिझकते हुए..
कहा था सुनो आपका दुपटा मिट्टी में लिपटा जा रहा है..
मै पलटी और दुपटे को सम्भालते हुए तेज़ी से आगे बढ़ गयी...
संकोच वश मै भी कुछ नही कह पाई थी..
....
 दो दिन कि मुलाक़ात का कुछ ऐसा असर था..
कि साजे दिल पे उभर आए थे वो गीत जो मुझे कभी पसंद नही थे..
हर पल उन लम्हों को सोचते हुए चहरे पर हँसी थी...
.....
तुम्हे ढूँढ रही थी मेरी नज़र पर तुम नही दिखे...
और ये सिलसिला पुरे एक हफ्ता चला..
और फिर उस दिन शाम को दिखे और मन खुशी से भर गया.
.सवाल तो कई थे..
पर कैसे पूछती..
.बस तुम्हे देखा के नज़र भर..
और शायद तुमने भी देखा था.
.तभी तो नज़र मिल गयी थी हमारी..
और कुछ सवाल जवाब भी होगए थे..
दुनिया कि नज़र से बच कर..हाँ और अब निगहों से बात करने का सील सिला चल निकला था.......
तुम्हे याद है वो दिन..
जब हमे ये पता चला कि हम एक ही कॉलेज में हैं..
मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा..और फिर मै तुम्हे हर दिन खोजता..
कंही तो दिखो..और तुम मिली भी तो लाइब्रेरी में..किताब पढ़ रही थी...
मैंने भी एक किताब लि और ठीक तुम्हारी सामने वाली बैंच पर बैठ गया...
पता है तुम कौन सा किताब पढ़ रहे थे..
मुझे देख ही तो रहे थे.. और जैसे मै देखती वैसे किताब में झाकने लगते...
ये सिलसिला भी काफी लम्बा चला..दो महिने...नही पुरे तीन महिने १५ दिन....
.हाँ हाँ.. पता है कि तुम्हे सब याद है...
तो बताओ जब तुमने मुझसे पहली बार बात कि थी तो क्या कहा था...
ये ही कि सुनो सुनो तुम्हारा दुपटा मिट्टी में लिप्टा जा रहा है...
(और हवा के साज़  में पंख फडड़ाते हुए जैसे उसने कबूल किया हो.. हाँ ये ही...)
......
अच्छा जब हम दोनों ने लफ्जों में बात कि हो..
वो दिन तो कभी नही भूल सकता...
कैसे भूलूं... पूरा दिन और और  दो दिन तक मै हँसता रहा..
सुनो क्या यंहा आज इतिहास कि क्लास लगेगी...
ये जानते हुए भी कि ये तो अंग्रेजी का विभाग है..
और तुमने तपाक से बोला था.
.ऊपर देखो क्या लिखा है...
हाँ और मै शर्मिंदा थी...
कि क्या बोल दिया क्या सोच रहें होंगे तुम मेरे बारे में....
....
खैर वो दिन भी आगया जब हमने खुल के बात कि..
और पुरे दो घंटे पर बात क्या कि आज तक समझ नही आया...
खैर.. अब बातों के सिलसिले निकल पड़े थे..
और कॉलेज के ही परिसर में देर तक क साथ बैठे रहना..
और सबका हमारी तरफ देखना..
अच्छा तो लगता था पर डर भी..
हाँ ये तो है तुम डरती बहुत हो..
अभी डरती हो...सुनो प्रेम में डर नही होता...
प्रेम में स्वाधीनता होती है.. प्रेम में चाह होती है...
अब शुरू मत हो जाना...
अपनी शायरी या फिर गीतों को लेकर..
माना तुम्हारी इसी अदा ने मुझे तुम्हारा कायल कर दिया था..
.जब मंच पर तुमने कविता का पाठ किया था..और शीर्षक तो लाजवाब था...
"उड़ने दो ना..."
हमे भी कुछ घरौंदे बनाने हैं....
प्रेम रूपी वृक्ष पर कई पुष्प खिलाने हैं...
उड़ने दो ना..
शानदार और वजनदार पंक्तियाँ जो आज भी मेरे जहन में हैं
....
उसी दिन से मै तुम्हारे करीब आगई..
और पुष्प रूपी प्रेम कि बगिया में...
तुम्हारे अंतर मन कि खसबू से खुद का अस्तित्व लपेट लिया
.....
.पर इस प्यार पर कितने पहरे थे....
पहरे थे हमारी सोच पर...
हमारे वर्तमान पर या यूँ कि हमारे भविष्य पर.
..खैर  इन सभी पहरों या नजरों से बचकर भी हम मिल लेते थे...
पर खुदा कि इस दुनिया में...
प्रेम कंहा फलता है उस पल नही समझ आ रहा था
...और वो दिन भी आगया जब हमारा प्रेम समाज और घर वालों कि नज़र में आगया
.. और तमाम पाबंदियों कि जंजीरे हमारे ऊपर डाल दी गयी..या यूँ कि कि मै जकड़ी गयी
...पिंजरे में कैद कर दी गयी
...चार दीवारी के घर में..
मेरी हँसी कि जगह मेरी सिसकियों कि आवाजें गुजने लगी...
मै लाडली थी अपने घर कि.. पर अब उनकी नज़र में गिर चुकी थी.
.क्या अपराध था ये ही कि प्रेम किया...पर घर वालों ने ही तो सिखाया था...
कि प्रेप से प्रेम करो...
प्रेम ही तो है जिसे खुशबू कि तरह हर जगह फैलाया जा सकता है...
या यूँ कि ये प्रेम किसी एक पर कुछ ज्यदा ही मेहरबान हो गया...
होता कैसे नही विचार एक थे..सोच एक थी...
नज़र में एक दूसरे के इज्जत बहुत थी...
पर नही रास आया....
और हम जुदा हुए........
तुम तो भावों में बह गई...
सुनो इन अश्रुओं का अब हमारे जीवन में कोई मोल नही...
तो मत बहाओ इन्हें.......
हाँ याद है वो आखरी पल जब तुम्हे देखा था..
और तुमने समझाया था इस जन्म में हम एक दूसरे के नही हो सके तो कोई बात नही...
अगला जन्म तुम्हारा मेरा होगा...
और हम चाहत के हर उस डाल पर बैठेंगे...
और उस डाल पर जब फूल और फूल से जब फल और जब वो फल पक जाएगा..
.तब उसका प्रेम बीज वंहा वंहा बोयेंगे जंहा नफरत हो गयीः .और बैठ सकेंगे हम जैसे कई प्रेमी युगलउन बीजों से उपजे प्रेम रूपी वृक्ष कि छांव में या डाल पर....

और तोड़ दिया था रूह से जिस्म का बंधन...
और आजद कर दी थी खुद कि हस्ती...
पंखे से लटके मेरे शरीर को देख कर वो रोये तो बहुत थे..
पर उनके मन खुशी थी..
कि घर कि इज्जत बच गई..
पर वो भूल गए कि मै कली थी उस आगं कि और तुम फूल..
जो खिलने से पहले ही तोड़े जा चूके थे..
समाज कि झूठी और खोक्ली रिज़जों कि बुनियाद को बचाने के लिए..
ये वो पुष्प है जो हर जगह उग तो जाते है.. पर समाज कि नीव को कमजोर नही मजबूत करते हैं..
पर आज भी समाज में प्रेम पढते सब हैं जब कोई करता है तो घिनौना अपराध समझते हैं..
...
पर आज मै खुश हूँ..
अपने इस रूप से कि तुम संग स्वतंत्रता के साथ उड़ सकती हूँ...
या यूँ कि हर पल तुम्हारे साथ रह सकती हूँ..
...
और हमारे जैसे ही कितने इस रूप में अपने अधूरे प्रेम को पूरा करतें हैं..
साथ साथ विचरण करते हैं..
समाज में रहते हुए.. भी समाज को दूषित नही समाज में उलास और प्रेम का वातावरण पैदा करते हैं.. !!

.....
और वो उड़ गए... पंख पसार उन्मुक्त गगन में...
प्रेम कि नई परिभाषा लिखने....
और गगन के बिम्ब को छूने...

                                                  .... "दिव्यंकर"