"किताब..."
मेरे दिल के करीब
...........
वो और मै अनजान थे..
पर पुस्तकालय कि वो कोने वाली जगह जंहा..
बल्ब कि मधम रौशनी
और मेज से लगी दीवार पर खिड्की..
खिड्की जंहा से पुस्तकालय का उपवन दिखता था..
और उपवन में मुस्कुराते हुए फूल..
गेंदा., गुलाब और गुडहल..!! और नरम नरम घास..
शायद दोनों को प्रिय था...
मुझे जो प्रिय था वो था.. स्ट्रीट लाईट और उसपे पतेंगे..
क्यूँ कि शाम को ७ बजे ही तो जाता था मै पुस्तकालय...
और वो भी इसी समय आता था..
...............
हम एक दूसरे से अजनबी थे..
पर चहरे से एक दूसरे को भली भांति
दो महिने से जानते थे..
शायद पुस्तकालय कि ख़ामोशी हमारे बीच भी घर कर गई थी...
तभी तो अब तक कोई बात नही कि..
हाँ कभी कभी चहरे पर मुस्कान लिए एक दूसरे को अभिन्दन कर देते थे..
...............
मै ज्यादतर नोवेल, कहानी संग्रह,
इतिहास या भूगोल कि किताबें पढा करता था..
और वो केवल विज्ञान आधारित कहानियाँ..(science fiction novel)
.................
आज पहेली बार उसके हाथ में कविता कि ६० पन्नों वाली किताब देखी..
थोडा हंसा फिर खुद को सम्भाल लिया..
आखिर पुस्तकालय था..
अक्सर वो मुझसे आधा घंटा पहले आता था..
शायद ठीक ६:३० बजे..
किताब लेटे समय वो समय जो डाल ता था..
नाम कि तरह ही वो था..
चहरे पर एक काँटी लिए... "ओजस."
..................
बहुत ही घम्भीर भाव से वो कविता का मन ही मन पाठ कर रहा था..
और कलम से कुछ लिख रहा था..
और साथ ही कुछ शब्द को रेखांकित कर रहा था..
.................
इशारों में वो मुझसे जाते जाते कह गया तुम बी पढ़ना अच्छी है..
अगले ही दिन मैंने भी
वही किताब ली..
और पढा..
भाव थे..
विचार थे..
पहली कविता पढ़ी..
और मै भी पढ़ने में मग्न ओ गया..
और ध्यान नही दिया कि वो आज आया ही नही..
और उसके लिखे पहले शब्द मैंने पढे...
पेज ८... तुम अजनबी मै अजनबी.. फिर भी मुलाकात है..
पेज १८.. खामोशियों के सिलसिले में.. जाने कितनी बात है..
पेज २८.. तुमहरा नाम बहुत प्यारा है.. ठीक तुम्हारी तरह..
हंसते हुए अच्छे लगते हो.. कहना चाहता हूँ.. पर कह नही पाया तो लिख दिया..
पेज ३८.. जीवन में मेरे बस दो मेरे साथी हैं.. एक किताब और एक शायद अब तुम
पेज ४८.. यंहा ख़ामोशी में कैसे तुम से बात करूँ.. कल (१६ को)शाम मिलना मुझे इसी पुस्तकालय के खिड्की से जो बाहर दिख रहा है उपवन में..
पेज ५८.. तुम सोच रहे होंगे कैसा है ये बात कि भी तो खामशी के साथ..
पेज ६८.. मै ऐसा ही हूँ सुनना पसंद है..
और जब तुम पढते हो तो भाव के साथ शायद इसी लिए तुम्हे सुनना चाहता हूँ..
किताब के अतिम पृष्ठ पर लिखा था...
ख़ामोशी भी एक जुबाँ है...
..............
मै तय समय तय वक्त पर पहुंच गया..
वो पहले से ही वंहा बैंच पर बैठ रखा था..
हाथ में एक गेंदे का फूल लिए...
उसके पास जाने से पहले मैंने स्ट्रीट लाईट..
और उसकी रौशनी में उसको देखा.. और उसके हाथ में फूल.. मन में गुदगुदाहट हुई..
और ये छवि मन भीतर बस गई..
...............
उसने अपना हाथ बढाया..
और हमने हाथ मिलाया..
फिर जो उसके हाथ में फल था वो दिया और कहा ये तुम्हारे लिए..
मैंने स्वीकार किया..
और उसदिन हमने पुस्तकालय के भीतर जाने कि बजाय..
वंही बातें कि..
........
वो: मेरा नाम ओजस..!!
मै: निर्वान..
वो: तुम हर शाम आते हो यंही पास में रहते हो..
मै: हाँ बस थोड़ी दूर पर..
और तुम..??
वो: शिवालिक नगर
मै: इतनी दूर से.. पढ़ने के काफी शौक़ीन हो...
वो: हाँ मेरे कमरे में बस है तो किताबें...
मै: घर में कौन कौन...
वो: पापा माँ और मैं..
मै: कंहा पढते हो
वो: मै देल्ही पब्लिक स्कूल
मै: तुमने कहा कोई दोस्त नही.. ऐसा क्यूँ कौन सी क्लास में हो..
वो: मै कम बोलता हूँ घूमना ज्यादा पसनद नही यंहा तक कि tuition भी नही जाता.. बस स्कूल स्कूल से घर और कुछ समय यंहा... बारहवी में हूँ...!!
वो: और तुम अपने बारे में बताओ..
मै: किताबे पढ़ना पसंद है.. दसवी में हूँ..
लिखना भी पसंद है.. और घूमना तो बहुत पसंद है.. हाँ tuition मै भी नही जाता बस कुछ समय यंहा बिताता हूँ...
वो: हम दोनॉ बोर्ड के छात्र हैं...
मै: हाँ.. तो आज से दोस्त..
वो: हाँ तभी तो यंहा बुलाया..
....................
अब दोस्ती हो गई ठीक ६ माह बाद...
एक दूसरे को जानने लगे समझने लगे..
और ख्याल रखने लगे..
उस समय हमारे पास mobile तो नही था..
हाँ कभी कभी लैंड लाइन से बात कर लिया करते थे..
हंसते थे..
मुस्कुराते थे..
ये सिलसिले बस कुछ दिनों के थे..
बोर्ड के एग्जाम जो आने वाले थे..
फरवरी के बाद से मिलना बंद हाँ फोन पर बात हो जाती थी..
अब तो वो भी नही...
मार्च का महीना. एग्जाम जो आगए थे...
..................
एग्जाम के बाद वो पुस्तकालय आया.. अप्रैल (१५)
ठीक अपने ही समय पर..
हमने आज बात कि एक दूसरे को अपने अपने एग्जाम के बारे में बताया..
और ये भी कि वो कोटा जा रहा है इंजीनियरिंग कि कोचिंग के लिए.. ठीक एक हफ्ते बाद
.....................
१६ अप्रैल ठीक ९ बजे सुबह
माँ: तेरी कॉल है ओजस है..
हाँ एक बार घर आया था..
उसने कहा चलो हरकी पौड़ी चलते हैं....
मैंने कहा ठीक है आजाओ... उसने कहा ठीक है मै १० बजे आता हूँ..
....................
हम घूमने गए खूब मस्ती कि...
आज पहली बार उसके चहरे पर एक खुशी देखी..
वो अंदर से खिलखिला रहा था एक गुलाब कि तरह..
.................
जाने से एक दिन पहले उसका कॉल आया...
निर्वान मिलोगे...
मैंने कहा हाँ कल तुम जा रहे हो.. ना
और उसने कहा ठीक है वंही मिलते हैं..
जंहा पहेली मर्तबा मिले थे..
आज उसके चहरे पर उदासी थी...
और हाथ में एक डैरी...
.....................
हमने बात कि...
उसके अंतिम शब्द... "निर्वाण.." पलकें भीगी हुई...
ये तुम्हारे लिए...
कुछ शब्द लिखें हैं तुम्हारे लिए...
पढ़ना क्यूँ कि मै बहुत कम बोलता हूँ...
और अपनी दोस्ती के लिए शुक्रिया..
कल सुबह कि ट्रेन है..
वंहा से फोन करूँगा...
अपना ख्याल रखना....
..........................
उसकि डैरी से..
कोरे कागज
नीली श्याही...
पर आज लाल रंग उड़ेल दिया...
ना जाने क्यूँ...
और रख दिया है...
वो गुलाब जो उसदिन पहली मुलाक़ात में देने को तोडा था...
पर संकोच वश नही दे पाया था..
......
तुम्हारी मुस्कान कि छवि दिल में लेकर जा रहा हूँ..
इस सोच के साथ कि ये मुझे गुदगुदाए कि जब मै उदास होंगा...
और तुम मेरे पास होंगे...
हाँ एक अनजान सा रिश्ता है तुमसे..
और ये रिश्ता क्या है नही जानता..
तुम्हे पहली बार जब देखा तो तुम पुस्ताकलय में कुछ ढुंढ रहे थे..
क्या नही जानता पर मैंने ढुंढ ली थी एक किताब..
जो तुमने गिरा दि थी..
और उसी पर मैंने उसदिन लिखे थे तुम्हारे लिए कुछ शब्द...
.पर आज बस इतना लिखना चाहता हूँ...
"अधूरी लिखी कहानियों का कोई शीर्षक नही होता.."
...................
उसकी आज तक कोई कॉल नही आई..
मै कई बार उसके घर गया पर ताला ही मिलता..
तो उनकी पडोस वाली आंटी ने एक दिन बताया बेटा वो पूरी फैमली के साथ हैदराबाद चले गए हैं...
ट्रांसफर हो गया था....
...................
फिर एक दिन पुस्ताकलय से हिम्मत कर के चुराली वो "किताब" "दिव्यंकर"
मेरे दिल के करीब
...........
वो और मै अनजान थे..
पर पुस्तकालय कि वो कोने वाली जगह जंहा..
बल्ब कि मधम रौशनी
और मेज से लगी दीवार पर खिड्की..
खिड्की जंहा से पुस्तकालय का उपवन दिखता था..
और उपवन में मुस्कुराते हुए फूल..
गेंदा., गुलाब और गुडहल..!! और नरम नरम घास..
शायद दोनों को प्रिय था...
मुझे जो प्रिय था वो था.. स्ट्रीट लाईट और उसपे पतेंगे..
क्यूँ कि शाम को ७ बजे ही तो जाता था मै पुस्तकालय...
और वो भी इसी समय आता था..
...............
हम एक दूसरे से अजनबी थे..
पर चहरे से एक दूसरे को भली भांति
दो महिने से जानते थे..
शायद पुस्तकालय कि ख़ामोशी हमारे बीच भी घर कर गई थी...
तभी तो अब तक कोई बात नही कि..
हाँ कभी कभी चहरे पर मुस्कान लिए एक दूसरे को अभिन्दन कर देते थे..
...............
मै ज्यादतर नोवेल, कहानी संग्रह,
इतिहास या भूगोल कि किताबें पढा करता था..
और वो केवल विज्ञान आधारित कहानियाँ..(science fiction novel)
.................
आज पहेली बार उसके हाथ में कविता कि ६० पन्नों वाली किताब देखी..
थोडा हंसा फिर खुद को सम्भाल लिया..
आखिर पुस्तकालय था..
अक्सर वो मुझसे आधा घंटा पहले आता था..
शायद ठीक ६:३० बजे..
किताब लेटे समय वो समय जो डाल ता था..
नाम कि तरह ही वो था..
चहरे पर एक काँटी लिए... "ओजस."
..................
बहुत ही घम्भीर भाव से वो कविता का मन ही मन पाठ कर रहा था..
और कलम से कुछ लिख रहा था..
और साथ ही कुछ शब्द को रेखांकित कर रहा था..
.................
इशारों में वो मुझसे जाते जाते कह गया तुम बी पढ़ना अच्छी है..
अगले ही दिन मैंने भी
वही किताब ली..
और पढा..
भाव थे..
विचार थे..
पहली कविता पढ़ी..
और मै भी पढ़ने में मग्न ओ गया..
और ध्यान नही दिया कि वो आज आया ही नही..
और उसके लिखे पहले शब्द मैंने पढे...
पेज ८... तुम अजनबी मै अजनबी.. फिर भी मुलाकात है..
पेज १८.. खामोशियों के सिलसिले में.. जाने कितनी बात है..
पेज २८.. तुमहरा नाम बहुत प्यारा है.. ठीक तुम्हारी तरह..
हंसते हुए अच्छे लगते हो.. कहना चाहता हूँ.. पर कह नही पाया तो लिख दिया..
पेज ३८.. जीवन में मेरे बस दो मेरे साथी हैं.. एक किताब और एक शायद अब तुम
पेज ४८.. यंहा ख़ामोशी में कैसे तुम से बात करूँ.. कल (१६ को)शाम मिलना मुझे इसी पुस्तकालय के खिड्की से जो बाहर दिख रहा है उपवन में..
पेज ५८.. तुम सोच रहे होंगे कैसा है ये बात कि भी तो खामशी के साथ..
पेज ६८.. मै ऐसा ही हूँ सुनना पसंद है..
और जब तुम पढते हो तो भाव के साथ शायद इसी लिए तुम्हे सुनना चाहता हूँ..
किताब के अतिम पृष्ठ पर लिखा था...
ख़ामोशी भी एक जुबाँ है...
..............
मै तय समय तय वक्त पर पहुंच गया..
वो पहले से ही वंहा बैंच पर बैठ रखा था..
हाथ में एक गेंदे का फूल लिए...
उसके पास जाने से पहले मैंने स्ट्रीट लाईट..
और उसकी रौशनी में उसको देखा.. और उसके हाथ में फूल.. मन में गुदगुदाहट हुई..
और ये छवि मन भीतर बस गई..
...............
उसने अपना हाथ बढाया..
और हमने हाथ मिलाया..
फिर जो उसके हाथ में फल था वो दिया और कहा ये तुम्हारे लिए..
मैंने स्वीकार किया..
और उसदिन हमने पुस्तकालय के भीतर जाने कि बजाय..
वंही बातें कि..
........
वो: मेरा नाम ओजस..!!
मै: निर्वान..
वो: तुम हर शाम आते हो यंही पास में रहते हो..
मै: हाँ बस थोड़ी दूर पर..
और तुम..??
वो: शिवालिक नगर
मै: इतनी दूर से.. पढ़ने के काफी शौक़ीन हो...
वो: हाँ मेरे कमरे में बस है तो किताबें...
मै: घर में कौन कौन...
वो: पापा माँ और मैं..
मै: कंहा पढते हो
वो: मै देल्ही पब्लिक स्कूल
मै: तुमने कहा कोई दोस्त नही.. ऐसा क्यूँ कौन सी क्लास में हो..
वो: मै कम बोलता हूँ घूमना ज्यादा पसनद नही यंहा तक कि tuition भी नही जाता.. बस स्कूल स्कूल से घर और कुछ समय यंहा... बारहवी में हूँ...!!
वो: और तुम अपने बारे में बताओ..
मै: किताबे पढ़ना पसंद है.. दसवी में हूँ..
लिखना भी पसंद है.. और घूमना तो बहुत पसंद है.. हाँ tuition मै भी नही जाता बस कुछ समय यंहा बिताता हूँ...
वो: हम दोनॉ बोर्ड के छात्र हैं...
मै: हाँ.. तो आज से दोस्त..
वो: हाँ तभी तो यंहा बुलाया..
....................
अब दोस्ती हो गई ठीक ६ माह बाद...
एक दूसरे को जानने लगे समझने लगे..
और ख्याल रखने लगे..
उस समय हमारे पास mobile तो नही था..
हाँ कभी कभी लैंड लाइन से बात कर लिया करते थे..
हंसते थे..
मुस्कुराते थे..
ये सिलसिले बस कुछ दिनों के थे..
बोर्ड के एग्जाम जो आने वाले थे..
फरवरी के बाद से मिलना बंद हाँ फोन पर बात हो जाती थी..
अब तो वो भी नही...
मार्च का महीना. एग्जाम जो आगए थे...
..................
एग्जाम के बाद वो पुस्तकालय आया.. अप्रैल (१५)
ठीक अपने ही समय पर..
हमने आज बात कि एक दूसरे को अपने अपने एग्जाम के बारे में बताया..
और ये भी कि वो कोटा जा रहा है इंजीनियरिंग कि कोचिंग के लिए.. ठीक एक हफ्ते बाद
.....................
१६ अप्रैल ठीक ९ बजे सुबह
माँ: तेरी कॉल है ओजस है..
हाँ एक बार घर आया था..
उसने कहा चलो हरकी पौड़ी चलते हैं....
मैंने कहा ठीक है आजाओ... उसने कहा ठीक है मै १० बजे आता हूँ..
....................
हम घूमने गए खूब मस्ती कि...
आज पहली बार उसके चहरे पर एक खुशी देखी..
वो अंदर से खिलखिला रहा था एक गुलाब कि तरह..
.................
जाने से एक दिन पहले उसका कॉल आया...
निर्वान मिलोगे...
मैंने कहा हाँ कल तुम जा रहे हो.. ना
और उसने कहा ठीक है वंही मिलते हैं..
जंहा पहेली मर्तबा मिले थे..
आज उसके चहरे पर उदासी थी...
और हाथ में एक डैरी...
.....................
हमने बात कि...
उसके अंतिम शब्द... "निर्वाण.." पलकें भीगी हुई...
ये तुम्हारे लिए...
कुछ शब्द लिखें हैं तुम्हारे लिए...
पढ़ना क्यूँ कि मै बहुत कम बोलता हूँ...
और अपनी दोस्ती के लिए शुक्रिया..
कल सुबह कि ट्रेन है..
वंहा से फोन करूँगा...
अपना ख्याल रखना....
..........................
उसकि डैरी से..
कोरे कागज
नीली श्याही...
पर आज लाल रंग उड़ेल दिया...
ना जाने क्यूँ...
और रख दिया है...
वो गुलाब जो उसदिन पहली मुलाक़ात में देने को तोडा था...
पर संकोच वश नही दे पाया था..
......
तुम्हारी मुस्कान कि छवि दिल में लेकर जा रहा हूँ..
इस सोच के साथ कि ये मुझे गुदगुदाए कि जब मै उदास होंगा...
और तुम मेरे पास होंगे...
हाँ एक अनजान सा रिश्ता है तुमसे..
और ये रिश्ता क्या है नही जानता..
तुम्हे पहली बार जब देखा तो तुम पुस्ताकलय में कुछ ढुंढ रहे थे..
क्या नही जानता पर मैंने ढुंढ ली थी एक किताब..
जो तुमने गिरा दि थी..
और उसी पर मैंने उसदिन लिखे थे तुम्हारे लिए कुछ शब्द...
.पर आज बस इतना लिखना चाहता हूँ...
"अधूरी लिखी कहानियों का कोई शीर्षक नही होता.."
...................
उसकी आज तक कोई कॉल नही आई..
मै कई बार उसके घर गया पर ताला ही मिलता..
तो उनकी पडोस वाली आंटी ने एक दिन बताया बेटा वो पूरी फैमली के साथ हैदराबाद चले गए हैं...
ट्रांसफर हो गया था....
...................
फिर एक दिन पुस्ताकलय से हिम्मत कर के चुराली वो "किताब" "दिव्यंकर"
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