गुलाब..!!
मेरे "ज़ेहन" में अक्सर महकते हैं.. तेरे नाम के "गुलाब"
मेरी बस एक "खू" चुनते रहना तेरे लिए "गुलाब"
मेरा "जुनून" बोते रहना तेरे लिए "गुलाब"
मेरे "बकौल" में बस जिक्र-ए-"गुलाब"
मेरे तेरे "फ़िराक" में मीलों तक बिछे हैं तो बस "गुलाब"
मेरी "तस्कीन" में खिलते हैं तेरी सोच के "गुलाब"
मिले जो "इमकान" कि सूरत तो तुझे दूँगा मै किताबों में बंद "गुलाब"
तुझसे करूँ जब भी कोई "पैमां" तो रख दूँ अपने होठों पर "गुलाब"
तेरी "क़दर" सहेज कर रख लेता हूँ मैं "गुलाब"
मेरी "अता" बस तेरे लिए लाल सुर्ख "गुलाब"
मेरा "बसर" दूर तलक बस खिलते मुस्कुराते "गुलाब"
तेरा "एहसान" तेरे दिए हुए "गुलाब"
होती हैं जभी "फ़सुर्दा" शामे तो नोच कर फेंक देता हूँ डालियों से "गुलाब"
मेरी "ज़ेहन" अक्सर खिलते रहते हैं तेरी यादों के "नादान" "गुलाब"
छा जाता है "नशा" जभी सूँघ लेता हूँ.. शब्दों में लिपटे मखमली "गुलाब"
"बे-पिए" एक "नशा" जभी चूम लेता हूँ "गुलाब"
मेरे "राग-ओ-मीना" में बहता है तेरे इश्क का "गुलाब"
मेरे "तन्हा" "आलम" में सुलगता है मेरे मन भीतर कोई सुखा हुआ मुरझाया हुआ तेरा भुलाया हुआ "गुलाब"
"तवक्को" यही उम्मीद यही कि "मुद्दत" में खिल जाए कोई बोया हुआ पिछले दिसम्बर का इस दिसम्बर में "गुलाब"
"गम-ए-दौरान" काँप उठता है नया नया ताज़ा खिला "गुलाब"
मेरी किताब का "उनवान" "गुलाब"
जिसके हर "औराक़" पर बस लिखा है "गुलाब" "दिव्यंकर" "२९ -१२-२०१३"
...............................................................................
गुलाब (एक फूल या एहसास)
ये कुछ पंकितयां गुलाब को अपने एहसास में ढाल कर लिखी है...
जो मिले मेरे मरने कि खबर तुम्हे एक रोज़.. "दिव्यंकर"
तो बो देना मेरे नाम का एक "गुलाब" अपने आँगन में..
............

मेरे आँगन में अक्सर शाम को महकते हैं तेरे नाम के "गुलाब"
...................................

छत पर एक फूलदान में..
खिल उठा महक उठा..
तेरी याद में बोया हुआ "गुलाब"
...............................................

काटों कि चुभन पाई
फूलों का मज़ा भी..
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हंसा भी...
काटों कि चुभन पाई फूलों का मज़ा भी...
तुम्हारे प्यार में.. तुम्हारे लिए
खरीद कर कुछ "गुलाब" रख दिए किताब में....

तुम्हे प्रिय हैं.. "गुलाब" जानता हूँ..
कल ही तो बताया तुमने..
चहरे पर मुस्कान के साथ..
और आज तोड़ कर डाली से मैंने सज़ा लिया अपनी किताब में "गुलाब"
इस सोच के साथ कि जब हम मिलेंगे..
तो तुम्हे दूँगा तुम्हारी यादों में ढूबे "गुलाब" "दिव्यंकर"
मेरे "ज़ेहन" में अक्सर महकते हैं.. तेरे नाम के "गुलाब"
मेरी बस एक "खू" चुनते रहना तेरे लिए "गुलाब"
मेरा "जुनून" बोते रहना तेरे लिए "गुलाब"
मेरे "बकौल" में बस जिक्र-ए-"गुलाब"
मेरे तेरे "फ़िराक" में मीलों तक बिछे हैं तो बस "गुलाब"
मेरी "तस्कीन" में खिलते हैं तेरी सोच के "गुलाब"
मिले जो "इमकान" कि सूरत तो तुझे दूँगा मै किताबों में बंद "गुलाब"
तुझसे करूँ जब भी कोई "पैमां" तो रख दूँ अपने होठों पर "गुलाब"
तेरी "क़दर" सहेज कर रख लेता हूँ मैं "गुलाब"
मेरी "अता" बस तेरे लिए लाल सुर्ख "गुलाब"
मेरा "बसर" दूर तलक बस खिलते मुस्कुराते "गुलाब"
तेरा "एहसान" तेरे दिए हुए "गुलाब"
होती हैं जभी "फ़सुर्दा" शामे तो नोच कर फेंक देता हूँ डालियों से "गुलाब"
मेरी "ज़ेहन" अक्सर खिलते रहते हैं तेरी यादों के "नादान" "गुलाब"
छा जाता है "नशा" जभी सूँघ लेता हूँ.. शब्दों में लिपटे मखमली "गुलाब"
"बे-पिए" एक "नशा" जभी चूम लेता हूँ "गुलाब"
मेरे "राग-ओ-मीना" में बहता है तेरे इश्क का "गुलाब"
मेरे "तन्हा" "आलम" में सुलगता है मेरे मन भीतर कोई सुखा हुआ मुरझाया हुआ तेरा भुलाया हुआ "गुलाब"
"तवक्को" यही उम्मीद यही कि "मुद्दत" में खिल जाए कोई बोया हुआ पिछले दिसम्बर का इस दिसम्बर में "गुलाब"
"गम-ए-दौरान" काँप उठता है नया नया ताज़ा खिला "गुलाब"
मेरी किताब का "उनवान" "गुलाब"
जिसके हर "औराक़" पर बस लिखा है "गुलाब" "दिव्यंकर" "२९ -१२-२०१३"
...............................................................................
गुलाब (एक फूल या एहसास)
ये कुछ पंकितयां गुलाब को अपने एहसास में ढाल कर लिखी है...
जो मिले मेरे मरने कि खबर तुम्हे एक रोज़.. "दिव्यंकर"
तो बो देना मेरे नाम का एक "गुलाब" अपने आँगन में..
............

मेरे आँगन में अक्सर शाम को महकते हैं तेरे नाम के "गुलाब"
...................................

छत पर एक फूलदान में..
खिल उठा महक उठा..
तेरी याद में बोया हुआ "गुलाब"
...............................................
तेरे प्यार में हथेली मेरी आज लाल होगई...
तोड़ते हुए.. "गुलाब"
कांटा जो कोई चुभ गया..
तोड़ते हुए.. "गुलाब"
कांटा जो कोई चुभ गया..

काटों कि चुभन पाई
फूलों का मज़ा भी..
दिल दर्द के मौसम में रोया भी हंसा भी...
काटों कि चुभन पाई फूलों का मज़ा भी...
.................................................

गुलाब.. लाल सुर्ख खास तेरे लिए.. तुझे पसंद है ना...
...................................................
तुम्हारे प्यार में.. तुम्हारे लिए
खरीद कर कुछ "गुलाब" रख दिए किताब में....
.......................................................................

तुम्हे प्रिय हैं.. "गुलाब" जानता हूँ..
कल ही तो बताया तुमने..
चहरे पर मुस्कान के साथ..
और आज तोड़ कर डाली से मैंने सज़ा लिया अपनी किताब में "गुलाब"
इस सोच के साथ कि जब हम मिलेंगे..
तो तुम्हे दूँगा तुम्हारी यादों में ढूबे "गुलाब" "दिव्यंकर"
No comments:
Post a Comment