Monday, 23 December 2013

कम्बल..!! (एहसासों कि मखमली चादर)

कम्बल..!! "एहसासों कि मखमली चादर"

चाय कि चुस्की..
और फिर ओढ़ कर तेरे गर्म एहसास को छत पर जाना.
और देखना स्ट्रीट लाईट पर पतंगे
और तुझे सोचना..
तुझे सोचते सोचते गुनगुना एक अधूरा याद गीत...."दिव्यंकर" २३-१२-१३
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सर्दी कि पहली बारिश
ऐसे में ओढ़े बैठा हूँ तेरे गर्म एहसास को..
और देख रहा हूँ..
बादल चाँद और बारिश.."दिव्यंकर" २२-१२-१३
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आज नशा था..
और दिल बेकरार..
मन में उमंगों कि नदी..
जो लहरे उठा रही थी..
ऐसे मेंबिखरना चाहता था..
गुलाब कि तरह सेज पर..
और तपते एहसास को एक ठंडी आह दि..
जिस्म कि गर्मी को तेरे नरम कोमल प्यार कि छांव दि..
ओढ़ कर लेट गया था जो मैं तेरे एहसास कि मखमली चादर.."दिव्यंकर" १८-१२-१३
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आज तन्हा था..
उदास था..
बेचैन था...
खोल कर खिड्की.. कमरे कि...
बुला लिया हवाओं
को..
और ओढ़ लिया तेरे एहसास को..
और रो पड़ा किसी बादल कि तरह.."दिव्यंकर" १२-१२-१३
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तेरे एह्साओं कि मखमली चादर..
जो हर रात मुझसे लिपट जाती है..
और मै टूट के बिखर जाता हूँ..
बिखर जाता हूँ..
और उतरने लगता हूँ जिस्म से पैबंद के धागे..
बोझ दिन भर का..
और अपनी थकान "दिव्यंकर" ०९-१२-१३
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