Monday, 23 December 2013

प्रेम मधुर संगीत

हुई शाम
आओ न एकबार करीब
आपना कंधा झुकाओ कि
मैं अपना सिर रखूं..
..कि कुछ सकून मिले
और एक दूसरे का थामे हाथ
चलो ना साथ में कंही चले
गुनगुनाते हुए कोई गीत "प्रेम मधुर संगीत...""दिव्यंकर"
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आज तुम्हारे साथ गुनगुनाना चाहता हूँ..प्रेम मधुर संगीत
जिसे कभी लिखा था मेरी उँगलियों ने..
सिर्फ तुमरे लिए..
उस मधुर संगीत में
बस हैं तो
कुछ लम्हे,
कुछ यादें,
तुम्हारी बातें,
तुम्हारा इतराना,
तुम्हारा खामोश रहना,

बेसुद सी
भागती रातें,
केवल सपने बुनना,
जुदाई
पागलपन,
और फिर तुम्हारे चले जाने पर
मेरा तडपना
रोना
रो कर बिखर ना
खुद को समेटना
मेरे अश्क
मेरी गुमनाम हंसी..
मेरा पागल पन..
......

इजाज़त हो तो सुनाऊं तुम्हे ... . "दिव्यंकर"

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