Sunday, 24 November 2013

करवा चौथ..!!

करवा चौथ..!!

 

..करवा चौथ..
ये कविता  किसी के अधूरे सपनों कि, तो किसी के मुकमल मोहब्बत कि..दास्ताँ हैं.. उस रात कि जिस का हर प्रेमी युगल को इन्तेज्ज़र रहता हैं..


एक हसीं रात..
चौथ का चाँद..
चिलमन कि आड़ से..
जलते दियों के प्रकाश में..
उस चाँद के नूर में..
तेरा दीदार..

एक ख्वाब था..
ख्वाब रह गया..
मेरा हर सपना..
आँसुओं के संग बह गया..

पर तेरी लम्बी उम्र..
मेरी पाक मोहब्बत..
जिस्म कि नही रूह कि तलब..
मै अपना वादा निभाऊंगा..
इस बार तेरी यादों के संग..
अधूरी मुलाकातों के संग
तेरी बातों के संग..
वो प्यार भरी तकरारों में..
यूँ रूठते मनाते जज्बातों में..
मैं करवा चौथ मनाऊंगा..
अपनी मोहब्बत के लिए
खुद के लिए..
मैं भीगी पलकों से..
उस हसीं रात..
चौथ का चाँद..
चिलमन कि आड़ से..
जलते दियों के प्रकाश में..
उस चाँद के नूर में..
तेरा दीदार..
को रात भर चाँद तकते तकते तुझे याद करते करते..
छत पर ही सो जाऊंगा..
ओंस कि बूंद से नहा कर..
फिर तेरे स्पर्श के एहसास से खिल जाऊंगा..
तेरे इंतज़ार कि उम्मीद में..        "दिवयंकर"

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