ये कविता उन्ही जख्मी लम्हों कि दास्ताँ.. और लिख भी रहा हूँ जख्मी हाथों से...
वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है..
शायद हाँ..
पर याद है जो वंही रह जाती है..
आज सुबह फिर वक्त के चिराग को हवा मिल गई और धुधली यादें ताज़ा हो गई..
एक पुराने जख्म कि तरह..
........
आज सुबह हाथों से..
शीशा टूट गया...
टूट के बिखर गया..
टूटे हुए मंजर में..
खुद देख रहा था...
मै खुद अंदर से टुटा हुआ महसूस कर रहा था...
एक पल ठहर गया..
फिर बिखरे काँच को..
समेटने लगा..
समेटते समेटते एक टुकड़ा हाथों में चुभ गया...
और खून बहने लगा..
तभी याद आई वो शाम जब मै छत पर था और उससे बातें कर रहा था..
और चाय का लुफ्त उठा रहा था..
तभी हाथों से प्याला छुट गया..
और काँच बिखर गया..
मै उसे समेटने लगा.. हाथ मै टुकड़ा चुभा दो दर्द से आवाज़ निकल पड़ी..
क्या हुआ..
चिल्लाए क्यूँ..
अरे कुछ नही काँच चुभ गया..
देख कर काम नही कर सकते और हातों से क्यूँ उठया..
चलो छोडो.. हटो वंहा से..
अरे कुछ नही हुआ.. बस जरा सा लगा है..
ठीक हो जाएगा..
कहा ना हटो वंहा से..
अरे तुम भी एक काँच ही तो चुभा है..
तभी दुबारा.. एक और टुकड़ा चुभ गया
पहले वाले से ज्यादा...
मत मनो मेरी बात
बस अपने मन कि करो..
... अच्छा ना अब नही करता पर किसी और को लग गया तो..
रुको एक तरफ कर देता हूँ...
एक बात कहूँ.. तुम्हारे लिए ऐसे कई जख्म सह
सकता हूँ..
मै काटों से लेकर तपती रेत पर चल सकता हूँ..
कहो तो अभी चलूं...
तुम पागल हो.. सच में..
और मै हंस दिया हाँ वो तो हूँ..
सुनो मै सच में पागल हूँ...
एक बात और इस काँच के जख्म तो भर जायेंगे... पर शायद तुमने कभी कोई जख्म दिया तो नही भरेंगे..
और वक्त के साथ उभर आयेंगे.. :'(
आज वो ही जख्म उभर आए.. :'(
चोट हाथ पर लगी पर दर्द तो दिल में हुआ... :'(
वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है..
शायद हाँ..
पर याद है जो वंही रह जाती है..
आज सुबह फिर वक्त के चिराग को हवा मिल गई और धुधली यादें ताज़ा हो गई..
एक पुराने जख्म कि तरह..
........
आज सुबह हाथों से..
शीशा टूट गया...
टूट के बिखर गया..
टूटे हुए मंजर में..
खुद देख रहा था...
मै खुद अंदर से टुटा हुआ महसूस कर रहा था...
एक पल ठहर गया..
फिर बिखरे काँच को..
समेटने लगा..
समेटते समेटते एक टुकड़ा हाथों में चुभ गया...
और खून बहने लगा..
तभी याद आई वो शाम जब मै छत पर था और उससे बातें कर रहा था..
और चाय का लुफ्त उठा रहा था..
तभी हाथों से प्याला छुट गया..
और काँच बिखर गया..
मै उसे समेटने लगा.. हाथ मै टुकड़ा चुभा दो दर्द से आवाज़ निकल पड़ी..
क्या हुआ..
चिल्लाए क्यूँ..
अरे कुछ नही काँच चुभ गया..
देख कर काम नही कर सकते और हातों से क्यूँ उठया..
चलो छोडो.. हटो वंहा से..
अरे कुछ नही हुआ.. बस जरा सा लगा है..
ठीक हो जाएगा..
कहा ना हटो वंहा से..
अरे तुम भी एक काँच ही तो चुभा है..
तभी दुबारा.. एक और टुकड़ा चुभ गया
पहले वाले से ज्यादा...
मत मनो मेरी बात
बस अपने मन कि करो..
... अच्छा ना अब नही करता पर किसी और को लग गया तो..
रुको एक तरफ कर देता हूँ...
एक बात कहूँ.. तुम्हारे लिए ऐसे कई जख्म सह
सकता हूँ..
मै काटों से लेकर तपती रेत पर चल सकता हूँ..
कहो तो अभी चलूं...
तुम पागल हो.. सच में..
और मै हंस दिया हाँ वो तो हूँ..
सुनो मै सच में पागल हूँ...
एक बात और इस काँच के जख्म तो भर जायेंगे... पर शायद तुमने कभी कोई जख्म दिया तो नही भरेंगे..
और वक्त के साथ उभर आयेंगे.. :'(
आज वो ही जख्म उभर आए.. :'(
चोट हाथ पर लगी पर दर्द तो दिल में हुआ... :'(
No comments:
Post a Comment