Sunday, 24 November 2013

शाम मै.. और सामने वाली छत...

ये कविता शाम के उन हसीं लम्हों कि कहानी है जो मेरे साथ हर शाम घटती है...
....
मै. छत और ढलता सूरज..
शाम गुलाबी लाल सूरज..
चिड़ियों का झुण्ड और बहती चंचल मंद पवन..
ऐसे में
सामने वाली छत और छत पर वो..
वो.. देखता है बादल में छुपे चाँद कि तरह..
मुस्कुराता है..
एक भर दीदार के बाद..
फिर नज़र नीचे किए..
वो यूँ देखता है बार बार..
मुझे हँसी आ जाती और शर्मा कर चला जाता है...
जाते जाते पलट कर फिर..
यूँ देख जाता है.. और कई सवाल पूछ जाता हैं..
...
शाम चाय कि चुस्कियां..
और छत पर टहलना
यूँ समाने कि छत.. पर नज़र जाना..
और देखना कि कोई देख रहा है..
फिर वही सिलसिला
सामने वाली छत और छत पर वो..
वो.. देखता है बादल में छुपे चाँद कि तरह..
मुस्कुराता है..
एक भर दीदार के बाद..
फिर नज़र नीचे किए..
वो यूँ देखता है बार बार..
मुझे हँसी आ जाती और शर्मा कर चला जाता है...
जाते जाते पलट कर फिर..
यूँ देख जाता है.. और कई सवाल पूछ जाता हैं..
....
इस सिलसिले को दो महिने से ऊपर हो चूके हैं..
अब बात हो जाती हैं नजरों से..
पर सवालों के कई जवाब अभी अधूरें हैं....??
....
कल शाम आस पास कि छत पर कोई नही..
ऐसे में वो चिलाया..
नाम नही जानते तो..
सुनो..
सुनो..
मैंने सुना इधर उधर देखा..
वो था छत पर..
और कुछ कहने कि कोशिश कर रहा था..
मै हंस दिया..
और वो फिर वो रोज़ कि तरह
शर्मा कर चला गया..
पर आज उसकी आँखों में गुस्सा था...
पर ओंठों पर हँसी...
सवाल तो कई जन्मे पर
जवाब ढूढ ना बाकी है...
..
शायद अब शाम होगी..
मै हूँगा और वो..
और फिर तमाम बातें.. सवाल जवाब... "दिव्यंकर"

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