जब सूरज ढलता.. तुमसे मिलने कि आस का दीपक जलता है..
तुम मिलते नही कंही तो मेरे ख्यालों के सोच के आईने में तुम उभर आते हो धुंधली तस्वीर के साथ...
और याद आतें हैं वो सब वादे जो हमने एक दूसरे के साथ किए थे..
और उसी सोच-ए-ख्याल में कुछ शब्द जो मेरे जहन में उठते हैं..
उनको लिख लेता हूँ...
........................................
बारिश थी.., गुलाब था...
मैं तन्हा और शाम का इंतज़ार था..
तेरे ख्यालों कि गुलाबी धूप में..
मेरे रुखसार का रंग भी कुछ लाल था..
आँखों में शबनम के मोती
तो पुरानी यादों कि गर्म हवा का साथ था..
बारिश थी.. गुलाब था...
पुराने msgs पढते हुए
खुद से ही बतलाते हुए..
सारी बातों का जिक्र आज था..
वो तमाम वादें..
वो तमाम कसमें..
सब ख़ाक था..
बारिश थी.., गुलाब था..
और आखों में सैलाब था..
(हम जिसे गा नही सकते
वक्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया...).. "दिव्यंकर".
...............................................................
कल वो ही शाम थी..
वो ही मंजर
वो ही लौटते हुए पंछियों के झुण्ड
मै भी वंही था..
पर तुम नही थे..
होते भी कैसे..
तुम हाथ छुडा कर आगे बढ़ गए..
और लिख गए मेरी किस्मत..
में डूबता हुआ सूरज.. काली यादों कि घनेरी रात..
और अश्कों से बरसात..
और उदास वीरान शाम........ "दिव्यंकर"
...................................................................
कल मज़ारे शाम पर फिर वही गज़ल सुनी
मधम दीपक कि लौ में जलते हुए
पतिंगे कि फरियाद सुनी..
सुलगते अरमानो कि बस्ती में..
गड़े दीवानों कि बात सुनी.
" मोहब्बत पाक नही..
मोहब्बत में अब वो बात नही..
मोहब्बत अब आम है..
दिल कि नही जिस्म कि बात है..
मोहब्बत एक हँसी मजाक है..
हीर-राँझा लैला-मजनूँ ये सब बकवास है..
अब नही किसी को किसी से सच्चा प्यार है..
ये खेल खेल ऐसा जिसमे दिलों का कारोबार है...." "दिव्यंकर"
तुम मिलते नही कंही तो मेरे ख्यालों के सोच के आईने में तुम उभर आते हो धुंधली तस्वीर के साथ...
और याद आतें हैं वो सब वादे जो हमने एक दूसरे के साथ किए थे..
और उसी सोच-ए-ख्याल में कुछ शब्द जो मेरे जहन में उठते हैं..
उनको लिख लेता हूँ...
........................................
बारिश थी.., गुलाब था...
मैं तन्हा और शाम का इंतज़ार था..
तेरे ख्यालों कि गुलाबी धूप में..
मेरे रुखसार का रंग भी कुछ लाल था..
आँखों में शबनम के मोती
तो पुरानी यादों कि गर्म हवा का साथ था..
बारिश थी.. गुलाब था...
पुराने msgs पढते हुए
खुद से ही बतलाते हुए..
सारी बातों का जिक्र आज था..
वो तमाम वादें..
वो तमाम कसमें..
सब ख़ाक था..
बारिश थी.., गुलाब था..
और आखों में सैलाब था..
(हम जिसे गा नही सकते
वक्त ने ऐसा गीत क्यूँ गाया...).. "दिव्यंकर".
...............................................................
कल वो ही शाम थी..
वो ही मंजर
वो ही लौटते हुए पंछियों के झुण्ड
मै भी वंही था..
पर तुम नही थे..
होते भी कैसे..
तुम हाथ छुडा कर आगे बढ़ गए..
और लिख गए मेरी किस्मत..
में डूबता हुआ सूरज.. काली यादों कि घनेरी रात..
और अश्कों से बरसात..
और उदास वीरान शाम........ "दिव्यंकर"
...................................................................
कल मज़ारे शाम पर फिर वही गज़ल सुनी
मधम दीपक कि लौ में जलते हुए
पतिंगे कि फरियाद सुनी..
सुलगते अरमानो कि बस्ती में..
गड़े दीवानों कि बात सुनी.
" मोहब्बत पाक नही..
मोहब्बत में अब वो बात नही..
मोहब्बत अब आम है..
दिल कि नही जिस्म कि बात है..
मोहब्बत एक हँसी मजाक है..
हीर-राँझा लैला-मजनूँ ये सब बकवास है..
अब नही किसी को किसी से सच्चा प्यार है..
ये खेल खेल ऐसा जिसमे दिलों का कारोबार है...." "दिव्यंकर"
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