Wednesday, 26 June 2013

कल रात चाँद रुसवा हो गया..

कल रात चाँद रुसवा हो गया..
किसी नज़र का शिकार हो गया..
कल रात चाँद रुसवा... रुसवा हो गया...

महफिल आम थी..
कुछ तो बात थी..
तन्हाइयों के साथ.. मुश्किलों भरी रात थी..
ऐसे में एक हम साया हो गया..
.................................... कल रात चाँद रुसवा हो गया..
किसी नज़र का शिकार हो गया..

गज़ल में बात थी..
शायरी के साथ थी..
सरगम का लहज़ा तो.... रागे तर्नुम.. में..
ज़िक्रे हजार हो गया...
..................................कल रात चाँद रुसवा हो गया ..
किसी नज़र का शिकार हो गया..

साकी.. तमाम..
जाम के साथ...
फिर भी जो छलका.. आँखों.. से मैकदा ...
हिजरे.. लाख पैमाने..
का वो एक जाम हो गया..
.................................. कल रात चाँद रुसवा हो गया..
किसी नज़र ...
नज़र.. हाँ.. नज़र का शिकार हो गया..
कल रात चाँद.. रुसवा.. हो गया....

No comments:

Post a Comment