Wednesday, 17 July 2013

बरसात...( भीगे लम्हे )...!!

बरसात ( भीगे लम्हे )
प्रेम कि वो फुहार जिसमे भीगना तो सब चाहते हैं.. पर घबराते हैं..
उसी प्रेम कि फुहार में डरते डरते मै भी भीग गया...!!
और अतृप्त मन के साथ रह गया बरसात के उन भीगे लम्हों में !

उसी अतृप्त मन  को लिखने कि एक कोशिश
....................................
प्रेम जब तक दूर था..
मै खुद के पास था..
जब तुम प्रेम रूपी नौका पे सवार होकर मेरे पास आए..
अपना हाथ मेरी तरफ बढाए
ऐसे में तुमको थाम लिया..
रिश्ता दोस्ती का तुमसे मान लिया..
हर पल साथ थे
हमारे  लिए
क्या दुख क्या सुख
हम एक दूजे के पास जो थे
मेरी गज़ल तेरे साज़ थे..
लहजा शायरी का और बातें तेरी थी..
दोस्ती से कुछ ज्यादा थे तुम
तभी जब पास नही तो बहुत दूर लगते थे..
ऐसे आखें बंद कर के जो सोचूं तुम्हे फिर तुम्ही तुम दिखते थे..
कब यूँ हम करीब आगए..
लोगों कि नज़र में भी आगए..
शक था तमाम पर खुद को संभाला भी था लाख..
पता था गलत है..
पर दिल मजबूर है...
हम बेबस थे लाचार थे..
पर निष्ठुर दुनिया  के आगे बहुत मजबूर थे..
प्रेम एक गम्भीर विषय है..
इस पर चर्चा तो सभी करते हैं पर सच कहूँ करने से डरते हैं..
और डरते डरते हम भी कर बैठे प्रेम..
एक दूजे से..
.... एक दूसरे को समझते थे.., शायद खुद से बेहतर जान ने लगे थे.. या यूँ कि..
एक दूसरे का ख्याल बहुत बेहतर ढंग से रखते थे..
शायद येही प्रेम हैं.. हाँ यंही है..
जंहा जज्बात बयाँ होते हैं.. निगाहों से...
जंहा बिना बोले ही सामने वाला आपकी हर बात समझ जाता है..
समझ जाता है आपके दिल का हाल...
या सासों कि रफ्तार से आपके अंदर चलने वाली उथल पुथल..
... वो भी समझता था मेरे हर भाव को चहरे के..
मुस्कुराहट का राज़ या बातों में चंचलता कि बात..
और मै उसके..
पर..
प्रेम कि कुछ कहानियाँ कभी पूरी नही होती..
ठीक उसी तरह जिस तरह हम बरसात में हथेली को फैलाए खड़े हो जाते हैं.. हथेली भीग तो जाती है..
पर बारिश कि बूदें मुठी बंद करने पर फिसल जाती है..
उसी तरह हमारा प्रेम भी एक दूसरे के दिल से फिसल गया..
या यूँ कि हमे ये फैसला लेना पड़ा वक्त को देखते हुए...
और साथ ही बहुत सारे फैसले..
जो ना चाहते हुए भी लिए..
क्यूँ ना लेते बरसात जब अधिक हो जाती है तो कीचड का रूप ले लेती है..
और सड़ने गलने लगते हैं.. उस मिट्टी में उपजे पुष्प..
हम अपने प्रेम रूपी पुष्प का ये ह्श्ल नही देखना चाहते थे..


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